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Jallianwala Bagh Massacre: इतिहास का दर्दनाक सच

Jallianwala Bagh Massacre: The Painful Truth of History

नवीमुंबई/सान्वी देशपांडे : आज जलियांवाला बाग हत्याकांड की 107वीं बरसी पूरे देश में श्रद्धा और शोक के साथ मनाई जा रही है। इस अवसर पर जलियांवाला बाग नेशनल मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा जलियांवाला बाग में विशेष श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया है, जिसमें शहीदों को नमन किया जाएगा और उनके बलिदान को याद किया जाएगा।

बैसाखी का वह काला दिन

13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन हजारों लोग जलियांवाला बाग में शांतिपूर्ण सभा के लिए एकत्रित हुए थे। उस समय रेजिनाल्ड डायर ने बिना किसी चेतावनी के अपने सैनिकों को निहत्थी भीड़ पर गोलियां चलाने का आदेश दे दिया। संकरी गलियों और सीमित निकास वाले इस बाग में फंसे लोगों के पास बचने का कोई रास्ता नहीं था। सैनिकों ने तब तक फायरिंग जारी रखी जब तक गोलियां खत्म नहीं हो गईं। इस अमानवीय घटना में सैकड़ों निर्दोष लोगों की मौत हुई, जबकि हजारों लोग घायल हुए।

यह घटना केवल एक नरसंहार नहीं थी, बल्कि ब्रिटिश शासन की क्रूरता का प्रतीक बन गई। पूरे देश में आक्रोश फैल गया और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा मिली। महात्मा गांधी समेत कई नेताओं ने इस घटना के बाद ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ अपने संघर्ष को और तेज कर दिया।

आज, 107 साल बाद भी यह घटना देश की चेतना में जीवित है। हर साल लोग यहां आकर शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं और उनकी कुर्बानी को याद करते हैं। यह दिन हमें स्वतंत्रता की कीमत और बलिदान की अहमियत का एहसास कराता है।

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