
Social Media पर बढ़ती वल्गैरिटी, क्या यही महिला सशक्तिकरण है !
Body display on social media: Women losing their identity in the race to get likes
चिंतन/ प्रियंका सौरभ : सोशल मीडिया पर उठते कोलाहल में हर ओर एक ही स्वर गूंज रहा है – देह प्रदर्शन का। कहीं चटकते-फड़कते रील्स में, कहीं भड़कते-उलझते डांस मूव्स में, और कहीं ज़ूम इन होती नज़रों के बीच, बस एक ही प्रदर्शन – अपनी चपल देह की अदा का। मानो देह ही पहचान बन गई हो। आखिर, क्या हो गया है आजकल औरतों को ? सच पूछो तो इस दौर में देह का कारोबार जितना खुलकर हो रहा है, उतना पहले कभी न हुआ था। सोशल मीडिया ने देह को एक ‘प्रॉडक्ट’ बना दिया है, जिसे जितना ज्यादा दिखाओ, उतना ज्यादा लाइक्स, फॉलोअर्स और व्यूज़ बटोर लो। मानो आत्मसम्मान का कद अब कमेंट्स की लंबाई और लाइक्स की संख्या से मापा जाने लगा हो। यह लाइक्स और फॉलोअर्स की दौड़ नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की गिरावट” है. यह एक डिजिटल पिंजरा है, जहां औरतें खुद की आजादी के चक्कर में एक गहरे बंधन में कैद होती जा रही हैं। हमें यह समझना होगा कि असली सशक्तिकरण आत्मनिर्भरता, शिक्षा और आत्मसम्मान में है, न कि केवल देह प्रदर्शन में।
यह डिजिटल क्रांति का अजीब दौर है, जहां औरतें ‘बोल्ड’ होने का झूठा अर्थ ‘बदन दिखाने’ से जोड़ बैठी हैं। यह कैसी आज़ादी है, जहां अपनी पहचान की कीमत देह के टुकड़ों में चुकानी पड़े? औरतें खुद को जिस फेमिनिज्म की आड़ में उभार रही हैं, क्या वो असल में नारी शक्ति का उत्थान है, या महज़ लाइक्स और फॉलोअर्स की दौड़? वो जो कभी सभ्यता की पहचान थी, अब डिजिटल हाट बाजार में बिक रही है। जिस समाज में नारी का सम्मान उसकी आंखों की लज्जा, चेहरे की सौम्यता और आचरण की मर्यादा से आंका जाता था, वहां आज उसका अस्तित्व उसके चोली के घेरे और पिंडलियों की नुमाइश में सिमट कर रह गया है। सोचिए, इस देह प्रदर्शन की होड़ में कितनी महिलाएं खुद को खो रही हैं? क्या यह वाकई सशक्तिकरण है या एक नया बंधन, जहां औरतें एक डिजिटल पिंजरे में फंसती जा रही हैं, अपनी असली पहचान को खोकर बस एक देह भर बनती जा रही हैं?
सवाल यह है कि क्या हमें इस डिजिटल कोलाहल से बाहर निकलकर असली स्वतंत्रता का अर्थ समझना होगा? या फिर हम बस लाइक्स और फॉलोअर्स के खेल में उलझकर अपने असली अस्तित्व को खो देंगे?
बोल्डनेस दिखाने की होड़ में नंगा होना कितना सही!
यह समस्या केवल महिलाओं की नहीं है, बल्कि उस पूरी डिजिटल संस्कृति की है, जिसने नारी शरीर को एक मनोरंजन सामग्री बना दिया है। वो शरीर जो कभी मातृत्व, प्रेम और करुणा का प्रतीक था, आज महज़ व्यूज़ और फॉलोअर्स की भूख का साधन बन गया है। नारी स्वतंत्रता का अर्थ केवल कपड़ों की लंबाई या शरीर के प्रदर्शन तक सीमित नहीं है। आज सोशल मीडिया पर कुछ महिलाएं खुद को साबित करने के लिए हर हद पार कर रही हैं। कपड़ों का छोटा होना और बोल्ड पोज़ देना ही अगर ‘बोल्डनेस’ है, तो फिर आत्मविश्वास, शिक्षा, और स्वाभिमान का क्या? क्या यही है सशक्तिकरण का असली मतलब? क्या हमारा समाज वाकई इतना सतही हो गया है कि हम केवल बदन के आधार पर किसी की कीमत आंकने लगे हैं?
डिजिटल कोलाहल से बाहर निकलना होगा?
तो सवाल यह है कि क्या हमें इस डिजिटल कोलाहल से बाहर निकलकर असली स्वतंत्रता का अर्थ समझना होगा? या फिर हम बस लाइक्स और फॉलोअर्स के खेल में उलझकर अपने असली अस्तित्व को खो देंगे? आखिर सवाल यह है कि क्या देह का प्रदर्शन वाकई सशक्तिकरण है या बस एक भ्रम? क्या आज की नारी अपनी असली पहचान से दूर होती जा रही है, जहां उसकी शक्ति, बुद्धि और आत्मविश्वास की जगह सिर्फ उसके शरीर का आकार और आकर्षण ही अहम रह गया है? यह डिजिटल युग हमें नई संभावनाओं और अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है, पर क्या यह स्वतंत्रता वाकई हमें आज़ाद कर रही है या बस एक और जाल में फंसा रही है?



