Minister Ashish Shelar Said | फिल्मों पर अब नहीं लगेगी अतिरिक्त सेंसरशिप: मंत्री शेलार का बड़ा बयान
Minister Ashish Shelar Said | Now there will be no additional censorship on films: Big statement by Minister Shelar
मुंबई / प्रतिनिधि : महाराष्ट्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि फिल्मों पर किसी भी प्रकार की अतिरिक्त सेंसरशिप या पाबंदी नहीं लगाई जाएगी। यह ऐलान राज्य के सांस्कृतिक कार्य मंत्री एडवोकेट आशीष शेलार ने विधान परिषद में एक प्रश्न के उत्तर में किया। उन्होंने कहा कि फिल्में सेंसर करने के लिए पहले से ही केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) नाम की वैधानिक संस्था मौजूद है और इसके बाहर जाकर कोई अतिरिक्त सरकारी हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा। विधान परिषद में नियम 101 के तहत माननीय डॉ. परिणय फुके द्वारा एक लक्षवेधी सूचना प्रस्तुत की गई थी, जिसमें उन्होंने कहा कि कई बार फिल्मों में राजनीतिक नेताओं का नकारात्मक चित्रण कर उनकी बदनामी की जाती है, इसलिए इस पर रोक लगनी चाहिए। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए मंत्री शेलार ने कहा कि भारतीय सिनेमा, खासकर मराठी और हिंदी फिल्मों में नेताओं, जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक माहौल का चित्रण वर्षों से होता आ रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह परंपरा नकारात्मक ही नहीं, बल्कि कई बार प्रेरणादायक और शिक्षाप्रद भी रही है। मंत्री शेलार ने 1970 और 1980 के दशक की याद दिलाते हुए कहा कि उस समय निळू फुले, राजशेखर, अरुण सरनाईक जैसे कलाकारों ने फिल्मों में रांगडे, बेरकी, सरपंच जैसे राजनेताओं की जटिल छवियां प्रस्तुत की थीं। उन्होंने डॉ. जब्बार पटेल द्वारा निर्देशित ‘सामना’ और ‘सिंहासन’ जैसी फिल्मों का उल्लेख किया, जो राजनीति की हकीकत से दर्शकों को रूबरू कराती थीं।
सिनेमा बना लोकतंत्र का दर्पण
शेलार ने कहा कि आधुनिक मराठी सिनेमा में भी राजनीति को लेकर गंभीर और प्रभावशाली टिप्पणी देखने को मिलती है। ‘नामदार मुख्यमंत्री गणप्या गावडे’, ‘गल्लीत गोंधळ, दिल्लीत मुजरा’, ‘नागरिक’, ‘रौंदळ’ जैसे फिल्मों ने राजनीति के अलग-अलग पहलुओं को सामने रखा है। हिंदी सिनेमा में भी ‘द कश्मीर फाइल्स’, ‘द केरल स्टोरी’, ‘एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’, ‘इमरजेंसी’, ‘द ताशकंद फाइल्स’ जैसी फिल्मों ने राजनीतिक इतिहास और नेतृत्व की वास्तविकताओं को दर्शकों के सामने प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है।
बॉक्स ऑफिस पर दर्शकों का सशक्त निर्णय
मंत्री शेलार ने बताया कि दर्शक अब परिपक्व हो चुके हैं और उन्हें यह भान है कि उन्हें क्या देखना है। हाल के वर्षों में कई राजनीतिक फिल्मों की बॉक्स ऑफिस पर सफलता इस बात का प्रमाण है। उदाहरण के तौर पर:
- ‘धर्मवीर’ (2022): लागत ₹8 करोड़, कमाई ₹25 करोड़
- ‘ठाकरे’ (2019): लागत ₹30 करोड़, कमाई ₹31.06 करोड़
- ‘पी.एम. नरेंद्र मोदी’ (2019): लागत ₹8 करोड़, कमाई ₹28 करोड़
- ‘एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ (2019): लागत ₹21 करोड़, कमाई ₹27 करोड़
जबकि कुछ फिल्मों ने उम्मीद के अनुसार प्रदर्शन नहीं किया, जैसे ‘संघर्ष योद्धा मनोज जरांगे पाटील’ (2024), जिसकी लागत ₹4 करोड़ थी लेकिन कमाई केवल ₹62 लाख रही।
कानूनी प्रावधान पहले से मौजूद
शेलार ने कहा कि सेंसर बोर्ड फिल्म की कहानी, भाषा, विषयवस्तु और प्रभाव को ध्यान में रखकर प्रमाणपत्र जारी करता है। अगर किसी फिल्म में किसी व्यक्ति विशेष की छवि धूमिल की जाती है, तो उसके खिलाफ सेंसर बोर्ड में शिकायत की जा सकती है। जरूरत पड़ने पर सेंसर प्रमाणपत्र रद्द भी किया जा सकता है। इसके अलावा, मानहानि से संबंधित IPC के तहत अलग से कानूनी कार्यवाही का भी प्रावधान है। इसलिए, इस प्रक्रिया के बाहर जाकर किसी फिल्म पर बैन लगाना या सेंसरशिप लागू करना संभव नहीं है। मंत्री शेलार ने यह भी बताया कि महाराष्ट्र सरकार जल्द ही राज्य की नई फिल्म नीति लाने जा रही है। इसमें फिल्म उद्योग के विशेषज्ञों का भी सहयोग लिया जाएगा। इसका उद्देश्य फिल्म निर्माण को बढ़ावा देना और फिल्ममेकर्स के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करना होगा। सरकार की यह घोषणा निश्चित रूप से रचनात्मक स्वतंत्रता के पक्ष में एक बड़ा कदम है। यह स्पष्ट संकेत है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी को संरक्षित रखते हुए सरकार अपनी सीमाओं में रहकर काम करेगी और कानूनन तय की गई प्रक्रिया के अनुसार ही फिल्म कंटेंट पर नियंत्रण रखा जाएगा।




