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भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौता: आर्थिक अवसरों की दस्तक, तो चुनौतियों की भी परीक्षा

India-UK Free Trade Agreement: Knocking on economic opportunities, but also testing challenges

नई दिल्ली, 13 मई 2025 : भारत और ब्रिटेन के बीच वर्षों की चर्चाओं और अटकलों के बाद आखिरकार मुक्त व्यापार समझौता (FTA) पूर्ण हुआ है। यह ऐतिहासिक करार न केवल दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को एक नई दिशा देगा, बल्कि वैश्विक व्यापार नीति में भारत की भूमिका को भी सशक्त करेगा। इस समझौते के तहत ब्रिटेन से भारत में आयात होने वाली 90% वस्तुओं पर शुल्क में कटौती की जाएगी, जबकि भारत से ब्रिटेन को निर्यात होने वाली 99% वस्तुओं पर टैक्स में विविध स्तरों पर छूट दी जाएगी। दोनों देशों के बीच व्यापार में 34 अरब डॉलर (लगभग तीन लाख करोड़ रुपये) की वृद्धि का अनुमान है। इस समझौते के जरिए भारतीय कुशल श्रमिकों और कंपनियों के लिए ब्रिटेन में कार्य करना पहले से कहीं अधिक सुगम हो गया है। विशेषकर कंपनी-आधारित ट्रांसफर पर जाने वाले कर्मचारियों को तीन साल तक सामाजिक सुरक्षा योगदान से छूट मिलेगी, जिससे उनके कॉस्ट-टू-कंपनी (CTC) में कमी आएगी। हालांकि, इस पर ब्रिटेन में स्थानीय रोजगार समर्थकों ने विरोध जताया है। भारत के लिए यह करार खासतौर से कपड़ा, आभूषण, कृषि उत्पाद (फल, सब्जियां, मांस, मछली), वाहन कलपुर्जे और चमड़ा उद्योग के लिए फायदेमंद सिद्ध हो सकता है। दूसरी ओर, ब्रिटेन की ओर से मद्य और लक्ज़री वाहनों की भारतीय बाजार में एंट्री अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाएगी। मद्य पर 150% आयात शुल्क को घटाकर पहले 75% और बाद में 40% तक लाने की योजना है, वहीं ब्रिटेन निर्मित मोटरों पर 100% शुल्क को 10% तक कम किया जाएगा – हालांकि इसमें केवल उच्च-मूल्य वाली कारें शामिल होंगी।

सेवा क्षेत्र और CBA नियमों पर मतभेद बरकरार

ब्रिटेन की लंबे समय से मांग रही है कि भारत में कानून और लेखा सेवाओं के क्षेत्र में ब्रिटिश कंपनियों को प्रवेश दिया जाए। परंतु भारत ने फिलहाल इस पर सहमति नहीं दी है। इसके पीछे ब्रिटेन का आईटी वर्क वीजा में सहयोग न करना एक बड़ा कारण माना जा रहा है| वहीं, ब्रिटेन 2027 से ‘कार्बन बॉर्डर अॅडजस्टमेंट मेकॅनिझम’ (CBAM) लागू करेगा, जिसके तहत एल्यूमिनियम, स्टील और उर्वरकों पर अतिरिक्त कर लगेगा। इन उत्पादों पर वर्तमान कर में छूट के बावजूद यह नया कर भारतीय निर्यातकों पर दबाव डाल सकता है। भारत ने इसपर “प्रत्युत्तर” की चेतावनी दी है। भारत ने ब्रिटेन को पीछे छोड़कर दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनकर अपना कद बढ़ाया है। लेकिन वैश्विक व्यापार नीति में सशक्त उपस्थिति के लिए केवल आंतरिक उत्पादन या श्रमिक बल पर्याप्त नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समझौतों की समझ, साहस और रणनीतिक निर्णय भी जरूरी हैं। यह समझौता इस दृष्टि से भारत के लिए एक ‘लिटमस टेस्ट’ साबित हो सकता है – जहां आर्थिक संभावनाएं और राजनीतिक विवेक का संतुलन साधना जरूरी है। जैसे-जैसे अमेरिका और यूरोपीय संघ से भी भारत के व्यापार समझौते की संभावनाएं बन रही हैं, वैसे-वैसे यह जरूरी है कि भारत अपने कृषि, लघु एवं मध्यम उद्योग क्षेत्रों को इन प्रतिस्पर्धाओं के लिए मानसिक और आर्थिक रूप से तैयार करे।

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