Dalits in India : जानवरों से बदतर रही है दलितों की जिंदगी, मैंने जीते हुए देखा हैः शशिकांत बिराजदार
Witnessed ''Dalits Living in Worse Conditions than Animals: Shashikant Birajdar"
सुधीर शर्मा/ मुंबई : 78 साल पहले गुलाम था, तब 144 साल पहले कुंभ का मेला किसने लगवाया था, उस समय तो छुआछूत थी. सोशल मीडिया पर घूम रहे इस पोस्ट ने तमाम टिप्पणियां आ रही हैं. सवाल जवाब हो रहे हैं.
1953 के दौरान 50 के दशक में आजादी के अभी चंद दिन ही हुए थे. ऐसे में उस दौर की सामाजिक व्यवस्था कैसी थी. इस पर पेश है नवी मुंबई के पूर्व उपमहापौर शशिकांत बिराजदार का संस्मरण..शशिकांत बिराजदार लिखते हैं कि ”सच है, हमारे बचपन में, 1953 से 1963 के बीच, हरिजन और अन्य गिरिजनों को गाँव के कुएँ से पानी भरने की अनुमति नहीं थी। वे कुएँ से दूर खड़े होकर पानी देखते थे, क्योंकि कुआँ उनके छूने या छाया से भी क्षतिग्रस्त हो जाता था, इसलिए वे टूटे हुए पानी को एक गड्ढे में जमा कर देते थे और उसमें नारियल का पानी भर देते थे। घर में केवल एक ब्राह्मण देशपांडी था और राजा के राजस्व संग्रहकर्ता कुलकर्णी थे। जाति व्यवस्था में ऊंची जाति होने के कारण उनका बहुत सम्मान किया जाता था। उनके बिना कोई अन्य ऊंची जाति पानी नहीं भर सकती थी। मुझे यह इतिहास आज भी याद है। प्राथमिक सरकारी ZP स्कूल में उन्हें कक्षा में नहीं बैठाया जाता था और जितना संभव हो सके उन्हें कक्षा से बाहर बैठाया जाता था।”
शाहू-फुले-अंबेडकर-गांधी नहीं पैदा होते तो…
अगर इस देश में शिव, शाहू, फुले, अंबेडकर, महात्मा गांधी पैदा नहीं हुए होते तो इस दलित समाज की हालत बदतर हो गई होती। मैंने उन्हें जानवरों से भी बदतर स्थिति में रहते हुए देखा है। साधारण मंदिर में प्रवेश नहीं था, कुम्भ मेले में क्या कह रहे हो…! डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने इस दलित समाज की दुर्दशा देखी और शहर आये..! यह संदेश दिया। सीखो, संघर्ष करो, सत्ता में भाग लो। समानता, मानवता, धर्म के लिए बौद्ध धर्म स्वीकार किया। तभी वह समाज आज सम्मान के साथ जी रहा है।लेकिन महात्मा गांधी ने जातिगत मतभेदों को तोड़ने के लिए गांव में जाकर और दलित बस्ती में रहकर अपने उच्च जाति के अनुयायियों में समानता लाने की कोशिश की। इसलिए उस समय एक पीढ़ी गांव में गई। और उन्होंने अपना और परिवार का जीवन बर्बाद कर दिया क्योंकि दलित/हरिजन बस्ती में रहने वाले या उससे संबंधित उच्च जाति के व्यक्ति और उनके परिवार को गांव द्वारा वली (बहिष्कृत) के रूप में घोषित कर दिया गया था। उस समय स्वतंत्रता आंदोलन में किसान परिवार की भागीदारी अधिक थी और वह उच्च जाति का था। चूंकि कृषि मुख्य व्यवसाय था, इसलिए वह गांव की गाड़ी चलाता था।
मिनरल वॉटर से नहाने वाले नेताओं की जमात क्या बनाएगी
आजादी के बाद से आज तक, प्रत्येक केंद्रीय राज्य सरकार ने इस शक्तिशाली उच्च जाति कृषक वर्ग की कृषि की रीढ़ तोड़ दी है। भारत सरकार ने कभी भी कृषि के लिए अलग से योजना और बजट की व्यवस्था नहीं की है। योजना आयोग द्वारा पूरे बजट का 1% भी कृषि के लिए प्रदान नहीं किया गया है, जिसका कड़वा फल आजादी के बाद की चौथी पीढ़ी भुगत रही है।” कहते हैं “किसान देश की शान”* *”त्यागी राजा, अन्नदाता, जगत का रखवाला. आज वह मरियाई माता रूपी प्रपंच सिर पर लेकर पोतराज की तरह भिखारी बन गया है…! चलो प्रयागराज…! कुंभ मेला…. राज ठाकरे ने जो कहा वो गलत क्या है !”* “यहाँ अपनी दीर्घशंका करने के बाद टिश्यू पेपर/मिनरल वाटर से नहाने वाले शासकों की जमात इस लोकतंत्र के बुद्धिमान मतदाताओं ने बनाई है…! कर्म का फल तो भोगना ही पड़ेगा…!
(श्री शशिकांत बिराजदार, नवी मुंबई महानगर पालिका के उप महापौर रह चुके हैं.)



