Color Fest Holi | मनाने दो मुझे भी जान-ए-मन त्यौहार होली में
Color Fest Holi: come Let us celebrate Holi, wilth all :

गुलाबी गाल पर कुछ रंग मुझ को भी जमाने दो
मनाने दो मुझे भी जान-ए-मन त्यौहार होली में
जी हां दोस्तों यह कविता है भारतेंद्रु हरिश्चंद्र की..जिसमें भाव है प्रेम का मस्ती का..प्रियतम से गुहार है कि चलो होली मनाएं…….जी हां होली है तो आनंद है, हुड़दंग है… शरारत है.., तभी तो सब जोगीरा गाते हैं…सरा रा सरारा होली है.. जी हां होली है भाई होली है.. होली उल्लास का उत्सव है, उमंग और आनंद की खुमारी का उत्सव है..हरे नीले पीले लाल गुलाबी जैसे हजार रंगों का उत्सव ..ये रंग जब मिलते हैं तब बनती है होली..हजारों रंगों के बीच खुद का रंग भूल जाने का उत्सव है होली. अनेक से एक होने का त्यौहार है…क्योंकि जब ये रंग मिलते हैं तब हमारी संस्कृति बनती हैं..सदभाव बनते हैं और मिट जाते हैं वैर, मिट जाती है दुर्भावना .और पैदा हो जाती है समरसता…तभी तो भारतेंदु हरिश्चंद्र लिखते हैं कि
गले मुझ को लगा लो ऐ मिरे दिलदार होली में
बुझे दिल की लगी भी तो ऐ, मेरे यार होली में …..कवि नीरज गोस्वामी लिखते हैं कि बुलाए जब तुझे वो गीत गा कर ताल पर ढफ की, जिसे माना किए दुश्मन, समझ लेना की होली है., करें जब पाँव खुद नर्तन, समझ लेना की होली है. हवाओं में घुला चन्दन, समझ लेना कि होली है….. होली हिन्दुस्तान में कब आरंभ हुई इसकी कोई पक्की तारीख तो नहीं है, लेकिन इसके पीछे की कहानी जरूर रोमांचक है. हिन्दू पांचांग के अनुसार वर्ष के आखिरी माह फाल्गुन की पुर्णिमा को होली मनाते हैं. इसके दूसरे दिन से हिन्दु नववर्ष प्रारंभ होता है..इस दिन आषाढ़ी के नए अन्न गेहूं और चना जैसी फसलें तैयार हो जाती हैं. होलिका में इन फसलों को डंडों पर बाँधकर भूनने की प्रथा है. संस्कृत में भुने हुए अन्न को होलका कहते हैं. होलका की राख को चंदन तिलक लगाने का भी रिवाज है.संभवतः यहीं से होली की परंपरा का आगाज हुआ हो..
भक्त प्रह्लाद से जुड़ी है होली की कहानी
नारद पुराण में लिखा है कि होली…भक्त प्रहलाद की विजय और हिरण्यकश्यप की बहन “होलिका” के विनाश का स्मृति दिवस है. कहते हैं कि राजा हिरण्यकश्यप के आदेश पर उसकी बहन होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गयी. होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में नहीं जलेगी, लेकिन प्रभु की कृपा से प्रहलाद बच गए और होलिका भष्म हो गई. इसीलिए इस पर्व को होलिका दहन भी कहते हैं. भविष्य पुराण में एक कथा महाराजा रघु से जुड़ी है. रघु राज में जब ढुन्दा नामक एक राक्षसी का उपद्रव बढ़ गया तब महर्षि वशिष्ठ ने बालकों को लकड़ी की तलवार, ढाल और प्रज्जवलित अग्नि लेकर जगह जगह हो हल्ला करने को कहा..तब का हो हल्ला आज की होली का प्रतीक है.
ब्रह्मपुराण में लिखा है रंग पर्व का महात्मय
इस दिन भगवान कृष्ण गोविंद की पालकी निकाली जाती है, भक्त नाचते गाते उत्सव मनाते हैं..कई पुराणों में इसे संवत जलाना भी कहते हैं कि क्योंकि यह वर्ष का अंतिम दिन होता है. इसलिए सब लोग हंसते गाते रंग, अबीर गुलाल लगाते हुए नए वर्ष का स्वागत करते हैं.. नरो दोलागतं दृष्टा गोविंदं पुरुषोत्तमं.
फाल्गुन्यां संयतो भूत्वा गोविन्दस्य पुरं ब्रजेत..
जैमिनी मीमांशा दर्शनकार ने अपने ग्रंथ में होली को होलिक अधिकरण कहकर संबोधित किया है जो होली की प्राचीनता और उसके महत्व को रेखांकित करती है. विन्ध्य प्रदेश के रामगढ़ में ३०० ईसा पूर्व का एक शिलालेख मिला है जिसमें पूर्णिमा को मनाये जाने वाले इस उत्सव का उल्लेख है. वात्सायन महर्षि ने अपने कामसूत्र में “होलाक” नाम से होली का वर्णन किया है. 7वीं सदी में लिखी गयी महाराजा हर्ष की रत्नावली में होली वर्णित है. 11वीं सदी में मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी ने हिन्दुस्तान की ऐसी मदमस्त होली का उल्लेख किया है जिसे हिन्दू मुस्लिम मिलकर मनाते थे… सम्राट अकबर और जहांगीर के राज्यकाल में शाही परिवार में भी होली बड़े समारोह के तौर पर मनायी जाती थी. यह उद्धरण होली के इतिहास और वर्तमान को जोड़ने की एक कड़ी है. इसे बताने का मकसद यही है कि नयी पीढ़ी अपनी उस परंपरा और त्यौहारों को जाने और समझे.
ईसाई और मुस्लिम समुदाय में बढ़ रही होली की खुमारी
होली का एक और रोचक पहलू भी सुन लीजिए…होली सिर्फ हिन्दुओं का या हिन्दुस्तानियों का त्यौहार नहीं है. दुनिया के कई देशों में कई और समुदाय भी होली को आनंद उत्सव के रूप में मनाते हैं. इटली को ही देख लीजिए यह इसाई देश है लेकिन यहां हर साल फरवरी के महीने में रेडिका के नाम से होली मनाते हैं..शाम के वक्त लोग तरह तरह के स्वांग बनाते हैं. कार्निवल की मूर्ति के साथ रथ सजाकर नाचते गाते हुए जाते हैं और अंत में रथ को सूखी लकड़ियों में रखकर जला देते हैं.उसी तरह जैसे होली जलाई जाती है. फ्रांस में नार्मंदी नामक स्थान पर घास से बनी मूर्ति को शहर में घुमाते हैं और उसे होलिका की तरह आग लगा देते हैं..बच्चे चिल्लाते हैं होल हल्ला मचाते हुए आनंद मनाते हैं.. जर्मनी में इस्टर के समय पेड़ों को काटकर गाड़ दिया जाता है और उसके आस पास घास डालकर आग लगा दी जाती है..लोग एक दूसरे के मुख पर रंग लगाते और आनंद मनाते हैं. स्वीडन के नार्वे में और साईबेरिया में बच्चे घर घर जाकर लकड़ी इकट्ठा करते हैं उसी तरह जैसा भारत के गावों में होता है फिर शाम को उसमें आग लगाकर उत्सव मनाया जाता है. दुनिया के सबसे विकसित देश अमेरिका में भी होली मनायी जाती है. होली का त्यौहार यहां हेलोईन के नाम से मनाया जाता है. ये तमाम विकसित देश हैं जहां होली की तरह ही त्यौहार मनाया जाता है.
भारत के पर्व त्यौहारों के पीछे वैज्ञानिक दृष्टिकोण
वैसे तो पश्चिम के लोग भारत को भूत-प्रेत और सपेरों का देश कहते रहे हैं लेकिन हकीकत ये है कि भारत के सभी पर्व त्यौहार, पूजा पाठ, चिंतन-दर्शन विज्ञान की कसौटी पर खरे-परखे हैं और उनका संबंध भौतिक जीवन की गुणवत्ता से है. भारत की परंपराओं में आनंदित जीवन का वैज्ञानिक दृष्टिकोण है..जिसे भारत के ऋषि मुनियों में लाखों वर्ष पहले खोज लिया था. एक रात में ही संपन्न होने वाला होलिका दहन, जाड़े और गर्मी की ऋतुओं के संधि काल में फैलने वाली चेचक, मलेरिया, खसरा जैसे संक्रामत रोगों के कीटाणुओं के विरूद्ध एक सामुहिक अभियान है. हर तरफ आग जलती है तो उससे वायुमंडल में पैदा होने वाला 140 डिग्री फारेनहाईट तक का तापमान कीटाणुओं को जलाकर नष्ट कर देता है. रंगारंग कार्यक्रम, खेल कूद, आनंद का उत्सव वसंत ऋतु में पैदा हुए आलस्य को दूर करता है और स्फूर्ति और ऊर्जा भरता है.. महर्षि सुश्रुत ने इसीलिए तो इसे पोषक ऋतु कहा है..
कफश्चितो हि शिशिरे बसन्ते अकार्शु तापित:।
हत्वाग्निं कुरुते रोगाना तस्तं त्वरया जयेतु ।।
पलाश के फूलों के रंग से क्यों खेलते थे होली
याद कीजिए पहले ढाक यानी पलाश के फूलों से रंग बनता था और होली खेली जाती थी. आयुर्वेद कहता है कि टेसू यानी पलाश के फूलों से बने रंग स्नायु तंत्र के तमाम रोगों से हमें बचाते हैं..एतत्पुष्प कफं पितं कुष्ठं दाहं तृषामपि। वातं स्वेदं रक्तदोषं मूत्रकृच्छं च नाशयेत।।दोस्तों होली सिर्फ रंगों का त्यौहार नहीं बल्कि भाईचारे का पर्व है. हाथों में अबीर गुलाल लेकर सबके माथे पर लगाते जाओ, सबसे दुआ आशीष लेते जाओ…इससे बढ़िया और क्या हो सकता है..यह एक होने का अहसास है…होली का एक अर्थ ये भी है कि अब बहुत हो लिया अब और नहीं…
कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र आईना दिखाते हैं
हैं गंदुमी चेहरे तो बदन सब के हरे हैं, रंगीन फुवारों से चमन दिल के भरे हैं..
है जश्न-ए-बहारां तो चलो होली मनाएं, इस रंग के सैलाब में सब मिल के नहाएं.हम उम्मीद करते हैं कि इस होली में आप भी प्यार और सद्भावना रंग घोलेंगे और आनंद में सराबोर हो जाएंगे..



