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EVM अनिवार्य नहीं फिर बैलेट पेपर से चुनाव क्यों नहीं ; ECI से राजीव मिश्रा का बड़ा सवाल

EVM is not mandatory, then why not elections with ballot paper; Rajiv Mishra's big question to ECI

चुनाव में पारदर्शिता सुनिश्चित करना निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी

नवी मुंबई / सुमित गायकवाड :निर्वाचन आयोग को भेजे गए एक खत ने ईवीएम पर चल रहे घमासान को एक बार फिर गरमा दिया है.  आरटीआई एक्टिविस्ट राजीव मोहन मिश्रा ने चुनाव आयोग को लिखित शिकायत देकर सवाल पूछा है कि जब नागरिक प्रतिनिधित्व कानून में ईवीएम अनिवार्य नहीं है तब देश भर में बैलेट पेपर से चुनाव क्यों नहीं हो रहे हैं. कुछ विशेष कानूनों और अधिनियमों का हवाला देते हुए राजीव मोहन मिश्रा ने इसका खुलासा किया है और निर्वाचन आयोग की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाते हुए चेतावनी भी दी है कि यदि 15 दिनों के भीतर उनके निवेदन पर कुछ निर्णय नहीं लिया गया तो वे अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे. बता दें कि बीते चुनावों में कांग्रेस आदि विरोधी दलें ने सत्तारूढ़ बीजेपी पर ईवीएम के दुरुपयोग के जरिए चुनाव जीतने का आरोप लगाते हुए देश भर में आंदोलन चलाया था लेकिन बाद में यह मुद्दा टांय टांय फिस्स हो गया. बीजेपी का पलटवार था कि विरोधी दल जब चुनाव जीतते हैं तब ईवीएम का मुद्दा नहीं होता और जब हार जाते हैं तब ईवीएम का सहारा लेकर निवार्चन प्रक्रिया को बदनाम करते हैं.

ईवीएम पर बढ़ता संदेह और सत्ताधारियों की मोनोपॉली

सामाजिक कार्यकर्ता राजीव मोहन मिश्रा ने पत्र में यह तर्क दिया कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं, खासकर हाल ही में संपन्न महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों के बाद। उन्होंने कहा कि पोस्टल बैलेट और ईवीएम के परिणामों में भारी अंतर देखा गया है, जिससे चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर संदेह बढ़ा है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि तकनीकी युग में सुरक्षित समझी जाने वाली व्यवस्थाओं में भी सेंध लगाई जा सकती है, और यदि ईवीएम में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी होती है, तो उसे सत्यापित करने के लिए कोई ठोस प्रणाली मौजूद नहीं है। निवेदन पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि यदि चुनाव आयोग 60 दिनों के भीतर उचित जवाब नहीं देता, तो सामाजिक कार्यकर्ता राजीव मोहन मिश्रा न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के लिए मजबूर होंगे।

बैलेट पेपर से चुनाव पर क्या कहता है कानून

राजीव मोहन मिश्रा ने अपने पत्र में रिप्रजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट 1951, इलेक्शन कंडक्ट रूल्स 1961 और 1988 में भारतीय संसद द्वारा स्वीकृत संशोधन प्रस्ताव का हवाला देते हुए कानूनी तर्क प्रस्तुत किए।

✔️ रिप्रजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट 1951 की धारा 59 – इसमें मतदान की दो प्रक्रियाएं शामिल हैं: बैलेट पेपर और ईवीएम।
✔️ 1988 का संसदीय संशोधन – यह संशोधन केवल कुछ चुनिंदा निर्वाचन क्षेत्रों में ईवीएम के उपयोग की अनुमति देता है, न कि सभी में।
✔️ इलेक्शन कंडक्ट रूल्स 1961 – इसमें मतदान और मतगणना की प्रक्रिया को लेकर नियम स्पष्ट किए गए हैं, जिससे चुनाव आयोग को दोनों प्रणालियों का उपयोग करने की स्वतंत्रता मिलती है।

क्या है निवेदन पत्र की मुख्य अपील?

भारतीय लोकतंत्र की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को मजबूत करने के उद्देश्य से सामाजिक कार्यकर्ता राजीव मोहन मिश्रा ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त, भारतीय निर्वाचन आयोग को एक लिखित निवेदन पत्र भेजा है। इस पत्र में आगामी सार्वजनिक विधानसभा चुनावों में कम से कम 30% निर्वाचन क्षेत्रों में बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग की गई है। “हमारे देश के लोकतंत्र को मजबूत बनाए रखने के लिए, हमारे शहीदों की कुर्बानी को सम्मान देने के लिए और संविधान निर्माताओं की मंशा को साकार करने के लिए जरूरी है कि चुनाव आयोग ईवीएम के साथ बैलेट पेपर का भी उपयोग करे। यह कदम चुनाव परिणामों की विश्वसनीयता बढ़ाने और जनता में भरोसा बनाए रखने के लिए आवश्यक है।” इनमें प्रमुख रुप से आगामी विधानसभा चुनावों में 30% निर्वाचन क्षेत्रों में बैलेट पेपर से मतदान हो।इन निर्वाचन क्षेत्रों का चयन लॉटरी पद्धति से किया जाए, ताकि निष्पक्षता बनी रहे। संवेदनशील और अति-संवेदनशील निर्वाचन क्षेत्रों को बैलेट मतदान से अलग रखा जाए। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) से मतदान वाले निर्वाचन क्षेत्रों में कुल मतों के 5% का वीवीपैट पर्चियों से मिलान हो।  वीवीपैट पर्चियों के सत्यापन के लिए ईवीएम मशीनों का चयन रैंडम तरीके से किया जाए।

क्या चुनाव आयोग बैलट पेपर की मांग स्वीकार करेगा

ईवीएम को लेकर संदेह और राजनीतिक बहस के बीच, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या चुनाव आयोग इस मांग को स्वीकार करेगा। यदि आयोग बैलेट पेपर को 30% सीटों पर लागू करता है, तो इससे ईवीएम बनाम बैलेट पेपर पर तुलनात्मक अध्ययन भी किया जा सकेगा। क्या भारतीय लोकतंत्र में बैलेट पेपर की वापसी होगी? क्या चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता बढ़ाने के लिए यह एक उचित कदम होगा? आने वाले दिनों में चुनाव आयोग का निर्णय इस बहस को और गहराई देगा।

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