MahaShivratri Special : महाशिवरात्रि पर भद्रा दोष का असर, जानें क्या है पूजा का शुभ मुहूर्त
MahaShivratri Special: Effect of Bhadra Dosh on Mahashivratri, know what is the auspicious time for worship
MahaShivratri Special: आज फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि है। आज देश भर में महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जा रहा है। महाशिवरात्रि के साथ ही आज महाकुंभ का समापन होगा। आइए जानते हैं महाशिवरात्रि पूजन, जलाभिषेक का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, आरती, चालीसा, मंत्र समेत सम्पूर्ण जानकारी।
महाशिवरात्रि पूजन से चन्द्र दोष से मिलती है मुक्ति
महाशिवरात्रि के दिन चंद्रमा अपनी सबसे कमजोर अवस्था में होता है, इसलिए भगवान शिव ने उसे अपने सिर पर धारण किया। मान्यता है कि इस दिन जो व्यक्ति भगवान शिव की पूजा करता है, उसकी कुंडली से चंद्र दोष समाप्त होता है और उसे मानसिक शांति मिलती है। इसके अतिरिक्त, यह भी माना जाता है कि इस दिन व्रत करने और भगवान शिव की उपासना करने से व्यक्ति सभी पापों से मुक्त होता है और मोक्ष की प्राप्ति करता है।
महाशिवरात्रि व्रत का महत्व :Maha Shivratri 2025 Vrat Significance
महाशिवरात्रि का व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो व्यक्ति इस दिन महादेव की पूजा के साथ व्रत का पालन करता है, उसे जीवन के सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है। इसके अलावा, जो अविवाहित कन्याएं शिवरात्रि का व्रत और पूजन करती हैं, उन्हें शीघ्र विवाह के अवसर प्राप्त होते हैं और मनचाहे वर की प्राप्ति होती है।
महाशिवरात्रि पूजन सामग्री : Mahashivratri Pujan Samagri
महाशिवरात्रि की पूजा के लिए जरूरी साम्रगी पहले से एकत्रित कर लेनी चाहिए। जोकि इस प्रकार है- धूप, दीप, अक्षत, सफेद, घी, बेल, भांग, बेर, गाय का कच्चा दूध, ईख का रस, गंगा जल, कपूर, मलयागिरी, चंदन, पंच मिष्ठान, शिव व मां पार्वती के श्रृंगार की सामग्री,पंच मेवा, शक्कर, शहद, आम्र मंजरी, जौ की बालियां, वस्त्राभूषण, चंदन, पान, सुपारी, लौंग, इलायची, दही, फल, फूल, बेलपत्र, धतूरा, तुलसी दल, मौली जनेऊ, पंच रस, इत्र, गंध रोली,
शिवलिंग पर जलाभिषेक मुहूर्त : Jalabhishek Muhurat on Shivlinga
मध्यान्ह मुहूर्त सुबह 11 बजकर 06 बजे से लेकर दोपहर 12 बजकर 35 बजे तक रहेगा। फिर संध्याकालीन मुहूर्त दोपहर 3 बजकर 25 बजे से शाम 6 बजकर 08 बजे रहेगा। इसके साथ ही आखिरी जलाभिषेक का मुहूर्त यानी रात्रिकालीन मुहूर्त 8 बजकर 54 मिनट पर शुरू होकर रात 12 बजकर 01 बजे तक रहेगा।
संतान प्राप्ति के लिए महाशिवरात्रि पर करें ये 3 उपाय
जो दम्पति संतान प्राप्ति में कठिनाई का सामना कर रहे हैं, उन्हें महाशिवरात्रि के दिन सच्चे मन से तीन प्रहर तक भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करनी चाहिए। इस दौरान शिवलिंग पर ताजे बांस की पत्तियाँ चढ़ाएं और संतान प्राप्ति की कामना को बार-बार व्यक्त करें। इस उपाय से आपको जल्द ही खुशखबरी मिल सकती है।
संतान प्राप्ति के लिए महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर दूध, मिश्री और घी मिलाकर शिवलिंग का अभिषेक करें। पूरे दिन सच्चे मन से व्रत रखें और शाम को अपने हाथों से खीर बनाएं। चार प्रहर की पूजा के बाद शिव जी को खीर का भोग अर्पित करें और फिर उसी खीर से अपना व्रत खोलें। इस उपाय को करने से आपको शीघ्र शुभ समाचार मिल सकता है।
यदि किसी कारणवश आपको संतान नहीं हो रही है, तो महाशिवरात्रि के दिन सच्चे मन से व्रत रखें। भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करें और उन्हें वस्त्र, श्रृंगार का सामान, बेलपत्र, मिठाई, फल, फूल, गेहूं और धतूरा अर्पित करें। साथ ही शिवलिंग का दूध से अभिषेक करें। इन अर्पणों से देवी-देवता आपसे प्रसन्न होंगे और आपकी मनोकामना को पूरा कर सकते हैं।
महाशिवरात्रि पर भद्रा का समय: Bhadra On Mahashivratri
ज्योतिष गणना के अनुसार 26 फरवरी को प्रातः 11 बजकर 08 मिनट से रात्रि 10 बजकर 5 मिनट तक भद्रा का साया बना रहेगा। लेकिन महादेव कालों के काल महाकाल हैं, इसलिए भद्रा का उनकी उपासना पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। ऐसे में महाशिवरात्रि पर पूरे दिन भोलेनाथ की पूजा की जा सकती है।
महाशिवरात्रि पर किस रंग के कपड़े पहनें: What Color To Wear On Mahashivratri
महाशिवरात्रि के विशेष अवसर पर हरे रंग के कपड़े पहनना बहुत शुभ माना जाता है। इसके अलावा, आप लाल, पीला, गुलाबी, नारंगी और सफेद रंग के कपड़े भी पहन सकते हैं, क्योंकि ये सभी रंग भगवान शिव को प्रिय हैं। इस पावन दिन पर पारंपरिक परिधान पहनना उचित है। महिलाएं कुर्ती, सूट या साड़ी पहन सकती हैं, जबकि पुरुषों को कुर्ता-धोती आदि पहनकर मंदिर जाना चाहिए।
क्यों की जाती है महादेव के शिवलिंग रूप की पूजा?
वेदों के अनुसार, भगवान शिव ही एकमात्र देवता हैं जिनकी पूजा लिंग के रूप में की जाती है। उन्हें समस्त ब्रह्मांड का मूल कारण माना जाता है, इसलिए उनकी लिंग रूप में पूजा की जाती है। भगवान शिव को आदि और अंत का देवता कहा गया है। उनका न कोई रूप है और न कोई आकार; वे निराकार हैं। लिंग को भगवान शिव का निराकार रूप माना जाता है, जबकि उनका साकार रूप शंकर है। शिवलिंग को निराकार ब्रह्म का प्रतीक माना जाता है। वायु पुराण के अनुसार, प्रलय के समय हर महायुग के बाद समस्त संसार इसी शिवलिंग में समाहित हो जाता है, और फिर इसी शिवलिंग से सृष्टि का आरंभ होता है। वेदों में ‘लिंग’ शब्द सूक्ष्म शरीर के लिए प्रयोग किया गया है, जो 17 तत्वों से मिलकर बना होता है।




