Big News | नवी मुंबई एयरपोर्ट पर लगेगा उद्योगपति रतन टाटा का नाम !

Does Navi Mumbai airport will be named after industrialist Ratan Tata!

मुंबईः क्या नवी मुंबई एयरपोर्ट से 2025 में पहली उड़ान हो सकेगी. क्या नवी मुंबई से दिल्ली और दुनिया भर की यात्रा का सपना इस साल पूरा हो सकेगा. क्या अप्रैल में पहली उड़ान से पहले नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर लोकनेता दिबा पाटिल का नामफलक लग जाएगा. कोई भी इसका खुला जवाब देने को तैयार नहीं है. इसलिए सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर वजह क्या है कि 3 साल बाद भी एनडीए सरकार एयरपोर्ट नामांतरण की घोषणा करने को तैयार नहीं है. कहीं ऐसा तो नहीं कि दिबा पाटिल के जिस नामफलक का इंतजार नवी मुंबई के प्रकल्पग्रस्त 8 वर्षों से कर रहे हैं उसे मोदी सरकार बदलने की फिराक में है. आज हम इन गंभीर सवालों का जवाब तलाशने का प्रयास करेंगे…

मेरा सवाल सुनकर आप चौंकिए मत…समझने की कोशिश कीजिए..कि जो सवाल उठ रहे हैं उसकी हकीकत क्या है. तमाम छानबीन और राजनीतिक सूत्रों से बातचीत के बाद यह बड़ा खुलासा हाथ लगा है कि केंद्र की मोदी सरकार नवी मुंबई एयरपोर्ट पर लोकनेता दिबा पाटिल का नाम नहीं देना चाहती है. बल्कि उनके बदले किसी ऐसी शख्सियत का नाम तलाश रही है जिसकी छवि भारत के साथ ही ग्लोबल हो. जिसका योगदान दिबा पाटिल की तुलना में और बड़ा हो. उस शख्सियत के काम भी प्रकल्पग्रस्त नेता दिबा पाटिल के कार्य और उपलब्धियों से उच्चतर हों.. और वह नाम महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि भारत के लिए अंतर्राष्ट्रीय पटल पर और व्यापक, महान और उपयोगी हो.

जो नाम सामने आ रहा है वह सर रतन टाटा का.. सूत्रों की मानें मोदी सरकार ने नवी मुंबई एय़रपोर्ट को सर रतन टाटा इंटरनेशनल एयरपोर्ट नाम देने पर विचार कर रही है. दिबा पाटिल का नाम देने में हो रही देरी इसके पीछे चल रही रणनीति का संकेत देती है. हालांकि आधिकारिक तौर पर कोई भी इसकी पुष्टि नहीं कर रहा है लेकिन सरकार के आंतरिक सूत्रों की मानें तो मोदी सरकार ने दिबा पाटिल के बदले नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट के लिए भारत की किसी अन्य शख्सियत का नाम चुन लिया है या चुनने की कोशिश में है. यह सिर्फ कयास नहीं हैं बल्कि सरकार द्वारा नामांतरण के लिए की जा रही तैयारियों का एक हिस्सा है. यह सब अंतर्राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में नवी मुंबई की छवि को और बड़ा बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. अगर ऐसा होता है तो फिर नवी मुंबईकरों के उन सपनों का क्या होगा जिसके साकार होने का इंतजार वे वर्षों से करते आ रहे हैं.

दिबा की जगह रतन टाटा का नाम क्यों और कौन देना चाहता है.

दुनिया जानती है कि टाटा समूह भारत की औद्योगिक और सामाजिक क्रांति का एक महान पहलू है. उद्योगपति रतन टाटा ने अपने जीवन काल में भारत की प्रगति को नई ऊंचाई दी. टाटा समूह के कारोबारी प्रयासों ने भारतीयों को सिर्फ रोजगार ही नहीं दिए हैं बल्कि मजबूत आर्थिक आधार भी दिए हैं. भारत की औद्योगिक छवि को दुनिया में ऊंचा उठाने और राष्ट्वाद के सिद्धांतों के साथ देश को आगे बढ़ाने का जज्बा टाटा समूह की पहचान रही है. देश का नमक, मोटर गाड़ी या कैंसर हॉस्पिटल जैसी तमाम अप्रतिम सुविधाएं, टाटा समूह की देन हैं. जेआरडी टाटा ने ही भारत को पहली एयरलाइंस दी. ऐसे में नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर रतन टाटा का नाम देकर मोदी सरकार देश के प्रति उनके योगदानों को सदैव जिवंत रखना और उन्हें महान श्रद्धांजलि देना चाहती है. चूंकि टाटा समूह दुनिया के अधिकांश देशों में कारोबार के जरिए भारत का झंडा बुलंद करता रहा है, इसलिए सरकार चाहती है कि नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट के जरिए उद्योगपति रतन टाटा के नाम का परचम  भी दुनिया भर में लहराए.

खैर यह बात सर रतन टाटा की है. यह सही है कि देश के लिए उनका योगदान अतुलनीय है लेकिन यह भी सही है कि जिस धरती पर बने नवी मुंबई एयरपोर्ट से उड़ान होने वाली है उसे बचाने वाला कोई और नहीं बल्कि दिबा पाटिल हैं. यह धरती और यहां के प्रकल्पग्रस्तों का अस्तित्व दिबा के संघर्षों एवं प्रयासों का नतीजा है.दिबा के अनेकों सामाजिक और राजनीतिक योगदान हैं. इसलिए प्रकल्पग्रस्त चाहते हैं कि नवी मुंबई एयरपोर्ट का नाम दिबा पाटिल इंटरनेशनल एयरपोर्ट दिया जाए. 2019 लेकर 2021 तक दिबा पाटिल के नाम पर दर्जनों आंदोलन हो चुके हैं.प्रकल्पग्रस्तों के इसी आंदोलन के चलते महाविकास आघाड़ी सरकार ने जाते जाते दिबा पाटिल के नाम पर नामांतरण प्रस्ताव को मंजूरी दे दिया था, जिसे बीजेपी महायुति सरकार ने मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में सुधारित किया और यही प्रस्ताव केंद्र की मोदी सरकार को भेजा गया. 40 महीने हो चुके हैं. मोदी सरकार की ओर से नवी मुंबई एयरपोर्ट नामांतरण प्रस्ताव पर कोई निर्णय, कोई घोषणा नहीं की गई है. लोकसभा और विधानसभा चुनाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद एयरपोर्ट जोन में आकर सभाएं कर गए लेकिन वहां भी किसी नेता या मंत्री या खुद प्रधानमंत्री ने एयरपोर्ट पर दिबा का नाम देने का ऐलान नहीं किया. लगातार देरी हो रही है..जो इस पर असमंजस पैदा कर रही है. इस पर सवाल उठाए जा रहे हैं कि जो भी हो एयरपोर्ट पर दिबा का नाम दिया जाना चाहिए..कोई बदलाव नहीं होना चाहिए.

नामांतरण में देरी का असली सच क्या है!

तो क्या यह मान लेना चाहिए कि इसी वजह से केंद्र की मोदी सरकार दिबा पाटिल का नाम देने में देरी कर रही है. महाराष्ट्र सरकार के आंतरिक सूत्रों की मानें तो अधिकांश मंत्री, नेता और स्थानीय विधायक सब इस देरी का कारण जानते हैं लेकिन प्रकल्पग्रस्तों के सामने बोलने की हिम्मत किसी में भी नहीं है. सब इस जानकारी को छुपाने और लीपा पोती करते दिख रहे हैं. वाशी में आयोजित लोकनेता दिबा पाटिल एयरपोर्ट नामांतरण समिति की बैठक को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है. सूत्रों की मानें तो समिति पदाधिकारी और मंत्री विधायक हर कोई प्रकल्पग्रस्तों की नब्ज को टटोलने में जुटा है कि आखिर नवी मुंबईकरों में नामांतरण को लेकर कैसा अंडर करेंट चल रहा है. यह बैठक भले ही एकजुटता दिखाने और नामांतरण के लिए दबाव बनाने के तौर पर प्रचारित की जा रही है लेकिन असल में बैठक का एजेंडा कुछ और था . एयरपोर्ट नामांतरण समिति की बैठक में सत्तारूढ़ सरकार के वन मंत्री गणेश नाईक एक तरफ यह कहते नजर आए कि एयरपोर्ट पर नामफलक तो दिबा का ही लगेगा . वहीं दूसरी तरफ बीजेपी की दूसरी विधायक मंदाताई म्हात्रे ने नामांतरण में देरी पर सवाल उठाया और साफ कहा कि प्रकल्पग्रस्त नामांतरण के लिए कमजोर पड़ रहे हैं. सवाल ये है कि सत्तारूढ़ सरकार के मंत्री और विधायक भी कांफिडेंस से यह कहने को आखिर तैयार क्यों नहीं हैं.

सरकार के मंत्री-नेता सब छुपा रहे सच्चाईःसूत्र

सरकार के मंत्री-विधायक-नेता सब छुपा रहे जानकारीःसूत्र

“असल में यह बैठक प्रकल्पग्रस्तों की तीव्र भावना को टटोलने और दिबा का नाम नहीं देने पर पैदा होने वाले आक्रोष का पता लगाने के लिए सिर्फ एक कवायद थी. इसकी सच्चाई छुपाई गई. बड़े नेता और पदाधिकारी हर कोई प्रकल्पग्रस्तों से इस बात छुपा रहा है. दिखाने के लिए दावा कर रहे हैं कि महाराष्ट्र ने जो प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजे हैं उसे हर हाल में स्वीकार किया जाएगा. एयरपोर्ट पर दिबा पाटिल का नाम जरूर मिलेगा. लेकिन कब मिलेगा इसका जवाब किसी के पास भी नहीं है.

आगामी मनपा चुनाव में वोट बटोरने की रणनीति तो नहीं..

सवाल ये है कि क्या नामांतरण समिति की बैठक बीजेपी महायुति के लिए वोट बटोरने की नई रणनीति तो नहीं है. ताकि अक्टूबर में होने वाले आगामी मनपा चुनाव में भुनाया जा सके. जो भी हो यह धोखा लगता है. सवाल उन प्रकल्पग्रस्तों के भरोसे का है जो यह मान कर बीजेपी महायुति को वोट देते आ रहे हैं कि यह सरकार उनके मसीहा को सम्मान देगी, नाम देगी और उनका भरोसा कायम रखेगी. फिलहाल एयरपोर्ट के मामले में सरकार के वादे आज भी अधूरे हैं. सरकार भरोसे पर खरी नहीं उतर पायी है. हम उम्मीद करते हैं कि जब एयरपोर्ट पर पहली उड़ान उतरेगी तब दिबा पाटिल नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर स्वागत का उद्धोष गूंजेगा. यदि इसके बदले सर रतन टाटा का नामकरण होगा तो जाहिर है यह प्रकल्पग्रस्तों की भावनाओं के खिलाफ होगा. जो उन्हें मंजूर नहीं । आज मुद्दे की बात में इतना ही..

 

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