क्वांटम तकनीक में बाटू की वैश्विक पहचान
Batu’s global recognition in quantum technology

नई दिल्ली/लोणेरे: डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर तंत्रशास्त्र विद्यापीठ (बाटू) ने क्वांटम कंप्यूटिंग के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। आईबीएम क्वांटम के वैश्विक कार्यक्रम ‘क्विस्किट फॉल फेस्ट 2026’ के लिए दुनिया भर से चुने गए 160 शैक्षणिक और शोध संस्थानों में विश्वविद्यालय को भी शामिल किया गया है। इस उपलब्धि से विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं को अत्याधुनिक तकनीक सीखने तथा वैश्विक स्तर पर अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का अवसर मिलेगा। इसी उपलब्धि के अवसर पर महाराष्ट्र क्वांटम टेक्नोलॉजी मिशन के अंतर्गत विश्वविद्यालय में तीन दिवसीय क्वांटम तकनीक प्रशिक्षण कार्यक्रम, कार्यशाला और हैकाथॉन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन महाराष्ट्र के उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री चंद्रकांतदादा पाटिल की उपस्थिति में हुआ। यह आयोजन 26 से 28 अक्टूबर तक निर्धारित है। इसमें महाराष्ट्र के विभिन्न इंजीनियरिंग कॉलेजों और शैक्षणिक संस्थानों के लगभग 150 विद्यार्थी तथा 50 प्राध्यापक हिस्सा ले रहे हैं। कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों को क्वांटम कंप्यूटिंग, क्वांटम प्रोग्रामिंग और आईबीएम के क्विस्किट प्लेटफॉर्म के व्यावहारिक उपयोगों की जानकारी दी जा रही है। विशेषज्ञों के व्याख्यान, कंप्यूटर प्रयोगशाला में प्रायोगिक प्रशिक्षण और हैकाथॉन के माध्यम से विद्यार्थियों को नई तकनीकों को समझने तथा समस्याओं के अभिनव समाधान विकसित करने का अवसर मिल रहा है। आईबीएम, भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान स्थान (आईआईएसईआर) और नैसकॉम, पुणे से जुड़े विशेषज्ञ इस कार्यक्रम में मार्ग-दर्शन दे रहे हैं।
महाराष्ट्र क्वांटम मिशन के तहत 2.5 करोड़ रुपये मंजूर
महाराष्ट्र सरकार के महत्वाकांक्षी ‘महाराष्ट्र क्वांटम टेक्नोलॉजी मिशन’ के अंतर्गत विश्वविद्यालय को 2.5 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की गई है। इस निधि से विश्वविद्यालय में अत्याधुनिक क्वांटम तकनीक प्रयोगशाला विकसित करने और प्राध्यापकों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करने की योजना है। इससे क्वांटम कंप्यूटिंग के क्षेत्र में शिक्षण, अनुसंधान और कौशल विकास को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। क्वांटम तकनीक को भविष्य की महत्वपूर्ण तकनीकों में गिना जाता है। इसके संभावित उपयोग कंप्यूटिंग, वैज्ञानिक अनुसंधान, स्वास्थ्य, सुरक्षा और उद्योग सहित अनेक क्षेत्रों में देखे जा रहे हैं। ऐसे में इस क्षेत्र में कुशल मानव संसाधन तैयार करना और विद्यार्थियों को व्यावहारिक प्रशिक्षण देना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री चंद्रकांतदादा पाटिल ने कहा कि क्वांटम तकनीक भविष्य की अर्थ-व्यवस्था, रक्षा, स्वास्थ्य और अनुसंधान के लिए महत्वपूर्ण साबित होगी। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय क्वांटम मिशन के पूरक के रूप में महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में क्वांटम तकनीक को बढ़ावा देने के लिए पहल की है। बाटू का आईबीएम के वैश्विक कार्यक्रम के लिए चुना जाना पूरे राज्य के लिए गर्व की बात है। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों तक विश्वस्तरीय तकनीकी शिक्षा पहुंचाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनके अनुसार, विश्वविद्यालय की उपलब्धियां केवल अत्याधुनिक तकनीक तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बांबू उद्योग, स्टार्टअप और जल संरक्षण जैसे क्षेत्रों में भी विश्वविद्यालय उल्लेखनीय कार्य कर रहा है।
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ग्रामीण विद्यार्थियों के लिए खुलेंगे वैश्विक अवसर
विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. डॉ. राजनीश कामत ने कहा कि स्थान राष्ट्रीय क्वांटम मिशन के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए कुशल मानव संसाधन तैयार करने, अनुसंधान को बढ़ावा देने और तकनीकी विकास में योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि ऐसे अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रमों से ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों को भी अत्याधुनिक तकनीक सीखने और वैश्विक अवसरों से जुड़ने का मौका मिलेगा। उन्होंने विश्वविद्यालय की कार्यशाला बताते हुए कहा कि ज्ञान से अनुसंधान, अनुसंधान से उद्योग और उद्योग से रोजगार के अवसर पैदा करना स्थान का प्रमुख उद्देश्य है। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के नाम पर स्थापित यह विश्वविद्यालय तकनीक के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन लाने की दिशा में भी काम कर रहा है। विश्वविद्यालय के प्र-कुलगुरु डॉ. विनोद मोहितकर ने बताया कि क्वांटम मिशन के अंतर्गत मिलने वाली राशि से नई प्रयोगशाला और प्रशिक्षण सुविधाओं को विकसित करने में मदद मिलेगी। वहीं, प्रो. डॉ. अरविंद किवळेकर ने कहा कि पिछले दो वर्षों में विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों और प्राध्यापकों ने क्वांटम तकनीक के क्षेत्र में लगातार शैक्षणिक और शोध संबंधी गतिविधियां की हैं। आईबीएम के वैश्विक कार्यक्रम में चयन को इसी प्रयास की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान के रूप में देखा जा रहा है।

बांबू उद्योग के जरिए रोजगार और उद्यमिता को बढ़ावा
क्वांटम तकनीक के साथ-साथ विश्वविद्यालय स्थानीय संसाधनों के उपयोग और रोजगार सृजन पर भी ध्यान दे रहा है। कोकण क्षेत्र में उपलब्ध बांबू की संभावनाओं को देखते हुए विश्वविद्यालय में बांबू कौशल विकास एवं अनुसंधान केंद्र शुरू किया गया है। इस केंद्र का उद्देश्य विद्यार्थियों और स्थानीय कारीगरों को प्रशिक्षण देना, बांबू आधारित उत्पादों के विकास को प्रोत्साहित करना और इस क्षेत्र में उद्यमिता के नए अवसर तैयार करना है। विश्वविद्यालय के सचिव डॉ. सचिन पोरे ने केंद्र की गतिविधियों, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और अनुसंधान सुविधाओं की जानकारी दी। इस दौरान विद्यार्थियों और स्थानीय कारीगरों द्वारा तैयार किए गए बांबू उत्पादों को भी प्रदर्शित किया गया। इन उत्पादों की सराहना करते हुए मान्यवरों ने कुछ वस्तुओं की खरीद भी की। विश्वविद्यालय का मानना है कि बांबू आधारित उद्योगों के विकास से स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सकेगा। इसके साथ ही कारीगरों को अपने कौशल को निखारने, नए उत्पाद तैयार करने और बाजार तक पहुंच बनाने के अवसर मिल सकते हैं। इससे क्षेत्र की अर्थ-व्यवस्था को मजबूती देने और रोजगार के नए अवसर पैदा करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
इनक्युबेशन केंद्र से स्टार्टअप को मिलेगा प्रोत्साहन
विद्यार्थियों की नई कल्पनाओं को व्यावसायिक रूप देने और उन्हें उद्यमी बनाने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय में इनक्युबेशन केंद्र भी स्थापित किया गया है। इस केंद्र के माध्यम से विद्यार्थियों को स्टार्टअप शुरू करने, अपने उत्पाद विकसित करने और विशेषज्ञों से मार्ग-दर्शन प्राप्त करने के अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। केंद्र की गतिविधियों की जानकारी देते हुए डीएफआईआईई के निदेशक डॉ. एस. एल. नलबलवार ने बताया कि यहां नवाचार, उद्यमिता और स्टार्टअप विकास को बढ़ावा देने पर ध्यान दिया जा रहा है। विद्यार्थियों को केवल नौकरी तलाश-ने तक सीमित न रखकर उन्हें रोजगार पैदा करने वाले उद्यमी के रूप में विकसित करना इस पहल का प्रमुख उद्देश्य है। इनक्युबेशन केंद्र के माध्यम से विद्यार्थियों को अपने विचारों को व्यावहारिक परियोजनाओं में बदलने और उत्पाद विकास की प्रक्रिया को समझने में सहायता मिल सकती है। विश्वविद्यालय की यह पहल शिक्षा को उद्योग और रोजगार से जोड़ने के प्रयासों का हिस्सा है।
जल संरक्षण से 30 से अधिक गांवों को सहारा
विश्वविद्यालय ने ग्रामीण विकास और जल संरक्षण के क्षेत्र में भी काम किया है। विश्वविद्यालय के सिविल इंजीनियरिंग विभाग ने रोटरी इंटरनेशनल के सहयोग से लोणेरे क्षेत्र में दो जल संरक्षण बांधों का निर्माण किया है। इन परियोजनाओं का उद्देश्य वर्षा जल का संचयन करना और आसपास के क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता को बेहतर बनाने में सहायता करना है। विश्वविद्यालय के सचिव डॉ. सचिन पोरे और डॉ. एस. आर. भगत ने परियोजना की जानकारी देते हुए जल संरक्षण और टिकाऊ जल प्रबंधन के महत्व को रेखांकित किया। इनमें से एक कमान के आकार का आरसीसी बांध लगभग 30 मीटर लंबा और 2 से 2.5 मीटर गहरा है। इसकी संरचना में दोनों ओर फ्लैंज वॉल बनाई गई हैं। इस बांध के कारण ऊपरी हिस्से में लगभग 1.5 किलोमीटर तक पानी का संचय हुआ है। जल जीवन मिशन के अंतर्गत बनाई गई 10 कुओं की व्यवस्था से जुड़ने के बाद इन परियोजनाओं से क्षेत्र के 30 से अधिक गांवों की जलापूर्ति को सहारा मिला है। विशेष रूप से गर्मियों में पानी की कमी का सामना करने वाले ग्रामीणों के लिए जल संरक्षण के ये प्रयास महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। विश्वविद्यालय ने इस परियोजना में सहयोग के लिए रोटरी इंटरनेशनल के प्रति आभार व्यक्त किया।
शिक्षा, तकनीक और ग्रामीण विकास को जोड़ने की पहल
कार्यक्रम के दौरान मंत्री चंद्रकांतदादा पाटिल और अन्य अतिथियों ने विश्वविद्यालय के बांबू प्रकल्प, इनक्युबेशन केंद्र और जल संरक्षण बांधों का निरीक्षण किया। इस दौरान विश्वविद्यालय की विभिन्न गतिविधियों और परियोजनाओं के बारे में जानकारी दी गई। क्वांटम कंप्यूटिंग जैसे भविष्य के तकनीकी क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय पहचान हासिल करने के साथ-साथ स्थानीय उद्योग, स्टार्टअप और जल संरक्षण के क्षेत्र में काम करना विश्वविद्यालय की व्यापक विकास दृष्टि को दर्शाता है। इन पहलों के माध्यम से विद्यार्थियों को आधुनिक तकनीकी ज्ञान उपलब्ध कराने, स्थानीय संसाधनों से रोजगार के अवसर पैदा करने और ग्रामीण समुदायों की जरूरतों के अनुरूप समाधान विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है। कुलगुरु प्रो. डॉ. राजनीश कामत, प्र-कुलगुरु डॉ. विनोद मोहितकर और सचिव डॉ. सचिन पोरे के मार्ग-दर्शन में आयोजित इस कार्यक्रम के संचालन में प्रो. डॉ. नेटक, प्रो. डॉ. अरविंद किवळेकर और प्रो. डॉ. हर्षा गायकवाड ने विशेष योगदान दिया।
क्वांटम तकनीक में प्रशिक्षण और अनुसंधान को बढ़ावा देने के साथ-साथ बांबू उद्योग, स्टार्टअप और जल संरक्षण की पहलों के जरिए विश्वविद्यालय शिक्षा को सामाजिक और आर्थिक विकास से जोड़ने का प्रयास कर रहा है।



