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गांधी शिल्प बाजार में आकर्षण का केंद्र बने पारंपरिक उत्पाद

Traditional products become the center of attraction at the Gandhi Shilp Bazaar.

 उत्तराखंड, रुड़की: रुड़की के नेहरू स्टेडियम में गांधी शिल्प बाजार का आयोजन किया जा रहा है। 9 से 15 अक्टूबर तक चलने वाले इस बाजार में देश के विभिन्न राज्यों से आए हस्तशिल्पियों और बुनकरों ने 50 से अधिक स्टॉल लगाए हैं। बाजार में पारंपरिक कला, हस्तनिर्मित उत्पादों और देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की झलक देखने को मिल रही है। विकास आयुक्त हस्तशिल्प, वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार की ओर से आयोजित इस बाजार का संचालन नवज्योति शिल्प विकास संस्थान कर रहा है। प्रदर्शनी में राजस्थान की बेडशीट, कालीन और ब्लॉक प्रिंट के कपड़े लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। वहीं, सहारनपुर की लकड़ी पर की गई नक्काशी और उत्तराखंड के पारंपरिक उत्पाद भी बाजार में खास आकर्षण बने हुए हैं।

गांधी शिल्प बाजार में कारीगरों को अपने हुनर और उत्पादों को सीधे ग्राहकों तक पहुंचाने का अवसर मिल रहा है। आयोजकों के अनुसार, इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य हस्तशिल्पियों और बुनकरों को अपने उत्पादों की बिक्री के लिए बेहतर मंच उपलब्ध कराना है, ताकि उन्हें बाजार मिल सके और उनकी पारंपरिक कला को प्रोत्साहन मिले। बाजार में पारंपरिक टोपियों और अन्य हस्तनिर्मित वस्तुओं के स्टॉल भी लोगों का ध्यान खींच रहे हैं।

    • असम का बांस और ‘ग्रीन गोल्ड’ से बनी कलाकृतियां, टोकरियाँ और बेंत के उत्पाद दर्शकों को सबसे अधिक लुभाते हैं।
    • असमिया चादर, मूगा रेशम, भागलपुरी सिल्क, और बनारसी साड़ियां व वस्त्र विशेष रूप से पसंद किए जाते हैं। 
    • बिहार की प्रसिद्ध मिथिला पेंटिंग (मधुबनी पेंटिंग), मंजूषा पेंटिंग और टिकुली पेंटिंग।
    • लखनऊ की मशहूर चिकनकारी और पारंपरिक कढ़ाई वाले वस्त्र।
    • गया का स्टोन क्राफ्ट और पंचधातु से बनी पारंपरिक मूर्तियां।
    • जूट से बने उत्पाद, माटी कला (मिट्टी के बर्तन और खिलौने), और स्थानीय खाद्य उत्पाद जैसे बनारसी पापड़।

यह आयोजन न केवल स्थानीय लोगों को देशभर की पारंपरिक कलाओं से रूबरू करा रहा है, बल्कि स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने और ‘वोकल फॉर लोकल’ की भावना को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

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