वैश्विक व्यवस्था में बढ़ती मध्यम शक्तियों की भूमिका पर बोले एस. जयशंकर
S. Jaishankar spoke on the role of rising middle powers in the global order.
नई दिल्ली: 62वें म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन के हिस्से के रूप में नई दिल्ली में आयोजित म्यूनिख नेताओं की बैठक में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने वैश्विक राजनीति में उभरती और मध्यम शक्तियों की बदलती भूमिका तथा उनकी रणनीतिक प्राथमिकताओं पर अपने विचार साझा किए। बैठक के दौरान उन्होंने बदलती वैश्विक व्यवस्था, ग्लोबल साउथ और ग्लोबल नॉर्थ के देशों की आकांक्षाओं तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके बढ़ते प्रभाव पर चर्चा की।
वैश्विक व्यवस्था में बदल रहा शक्ति संतुलन
डॉ. एस. जयशंकर ने कहा कि आज की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था तेजी से परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। दुनिया के विभिन्न देशों की आर्थिक, राजनीतिक और रणनीतिक क्षमताओं में बदलाव हो रहा है। ऐसे में उभरती और मध्यम शक्तियों की भूमिका पहले की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वैश्विक स्तर पर प्रभाव अब केवल पारंपरिक बड़ी शक्तियों तक सीमित नहीं रह गया है। अनेक देश अपनी आर्थिक क्षमता, तकनीकी सामर्थ्य, रणनीतिक स्वायत्तता और कूटनीतिक प्रभाव के आधार पर वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अपनी भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
ग्लोबल साउथ और ग्लोबल नॉर्थ की अलग-अलग परिस्थितियां
विदेश मंत्री ने कहा कि ग्लोबल साउथ और ग्लोबल नॉर्थ के देश अलग-अलग परिस्थितियों से उभर रहे हैं। दोनों समूहों के सामने चुनौतियां और प्राथमिकताएं अलग हो सकती हैं, लेकिन इसके बावजूद उनकी एक महत्वपूर्ण साझा इच्छा है—वैश्विक स्तर पर अधिक प्रासंगिक बनना और अंतरराष्ट्रीय मामलों में अधिक प्रभाव डालना। जयशंकर के अनुसार, वर्तमान समय में देशों के लिए यह जरूरी है कि वे अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ-साथ वैश्विक परिस्थितियों को भी समझें। बदलती दुनिया में सहयोग, संवाद और रणनीतिक संतुलन के माध्यम से ही विभिन्न देश अपने हितों को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ा सकते हैं।
मध्यम शक्तियों के लिए बढ़ रहे अवसर
बैठक में उभरती और मध्यम शक्तियों की रणनीतियों पर भी चर्चा हुई। बदलते वैश्विक समीकरणों में इन देशों के सामने अपनी भूमिका को पुनर्परिभाषित करने के नए अवसर पैदा हो रहे हैं। भारत लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता, बहुपक्षीय सहयोग और ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने पर जोर देता रहा है। ऐसे में जयशंकर की टिप्पणी को वैश्विक शक्ति संतुलन में भारत की बढ़ती भूमिका के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।
भारत की कूटनीतिक भूमिका पर नजर
नई दिल्ली में म्यूनिख नेताओं की बैठक का आयोजन ऐसे समय में हुआ है जब वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक और आर्थिक बदलाव तेज हैं। सुरक्षा, व्यापार, तकनीक, आपूर्ति श्रृंखला और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दे देशों की रणनीतिक प्राथमिकताओं को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे वातावरण में भारत स्वयं को एक जिम्मेदार, स्वतंत्र और प्रभावशाली वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने की दिशा में लगातार सक्रिय है। जयशंकर का संबोधन इसी व्यापक वैश्विक विमर्श का हिस्सा रहा, जिसमें उभरती शक्तियों की भूमिका और भविष्य की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर विचार साझा किए गए।
वैश्विक प्रभाव बढ़ाने की साझा आकांक्षा
जयशंकर के वक्तव्य का प्रमुख संदेश यही रहा कि ग्लोबल साउथ और ग्लोबल नॉर्थ के देशों की परिस्थितियां भले ही अलग हों, लेकिन दोनों में वैश्विक मामलों में अधिक प्रभावी भूमिका निभाने की आकांक्षा मौजूद है। आने वाले समय में यह आकांक्षा अंतरराष्ट्रीय संबंधों और वैश्विक शक्ति संतुलन को किस दिशा में ले जाती है, यह महत्वपूर्ण विषय रहेगा।
कुल मिलाकर, नई दिल्ली में हुई म्यूनिख नेताओं की बैठक ने बदलती वैश्विक व्यवस्था में उभरती और मध्यम शक्तियों की भूमिका पर महत्वपूर्ण चर्चा को सामने रखा। विदेश मंत्री एस. जयशंकर के विचारों ने भारत की कूटनीतिक सोच और वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलती परिस्थितियों पर नई दिल्ली के दृष्टिकोण को भी रेखांकित किया।



