
Chh.Shivaji Statue : शिवस्मारक विवाद: 4 महीने तक क्यों ढका रहा पुतला, उद्धाटन की होड़ या चुनावी स्टंट
Shiva Memorial Controversy: Why was the statue covered for four months? Was it a race for inauguration or an election stunt?
तुषार पाटिल/ प्रतिनिधिः नवी मुंबई नेरुल के
राजीव गांधी फ्लाईओवर के पास स्थापित छत्रपति शिवाजी महाराज का भव्य सिंहासनारूढ़ पुतला—चार महीनों से पूरी तरह तैयार होकर भी कपड़े में लिपटा पड़ा रहा। कारण सिर्फ एक: उद्घाटन का श्रेय किसे मिले?
और इसी सवाल ने नवी मुंबई की राजनीति को गरमा दिया है।
16 नवंबर को महाराष्ट्र नवनिर्माण युवा सेना के अध्यक्ष अमित ठाकरे ने मनपा की अनुमति के बिना अपने कार्यकर्ताओं के साथ पुतले का अनावरण किया। जनभावना को देखते हुए यह कदम स्वागतयोग्य माना गया, लेकिन प्रतिमा लोकार्पण में जो पद्धति अपनाई गई उस पर कई सवाल उठाए गए। पुलिस ने अमित ठाकरे और मनसे के 70 कार्यकर्ताओं पर मामला दर्ज कर दिया।
सबसे बड़ा विवाद तब भड़क उठा जब मनसे के लोकार्पण के मात्र 24 घंटे के भीतर, एनएमएमसी ने आधी रात को पुलिस बंदोबस्त के बीच प्रतिमा को फिर से ढक दिया। इस कदम को सत्तारूढ़ दल बीजेपी के दवाब में लिया गया फैसला माना गया.यह तब और स्पष्ट हो गया जब 21 नवंबर को वन मंत्री गणेश नाईक और तमाम स्थानीय नेताओं की मौजूदगी में पुतले का आधिकारिक अनावरण किया गया। इस कार्यक्रम में मनपा द्वारा बीजेपी समेत सभी पार्टियों प्रमुखों को बुलाया गया था. खास तौर डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे को आमंत्रित किया गया था लेकिन वे नहीं आए. उनके स्थानीय पदाधिकारी भी बीजेपी नेताओं के साथ दूरी बनाते दिखे। कार्यक्रम में सत्तारूढ़ दल के बीच राजनीति वैर साफ तौर पर देखने को मिली।
बड़ा सवाल यही है—
क्या वास्तव में यह कार्यक्रम छत्रपति शिवाजी महाराज को सम्मान देने के लिए था, या फिर आने वाले चुनावों में अपने वर्चस्व साबित करने की जल्दी थी.मनसे द्वारा खुद से प्रतिमा का अनावरण अराजकर राजनीति का संकेत रहा लेकिन वहीं महानगर पालिका की नीयत पर भी सवाल है कि ४ महीनों से बनकर तैयार पुतले के अनावरण में देरी का मतलब क्या है. आज जबकि प्रशासक राज चल रहा है तब आखिर किसे फायदा पहुंचाने या उद्धाटन का श्रेय देने पुतले का लोकार्पण रोका गया.
शिवाजी महाराज का पुतला जनता की आस्था, इतिहास और स्वाभिमान का प्रतीक है। परंतु पिछले चार महीनों में जिस तरह इस स्मारक के चारो ओर श्रेय की लड़ाई, कागजी अड़ंगे और राजनीतिक स्टंट चलते रहे, उससे यह स्पष्ट हो गया है कि कई नेताओं के लिए शिवाजी महाराज सिर्फ चुनावी मुद्दा बनकर रह गए हैं।
शिवप्रेमी नागरिकों का रोष भी अब मुखर है—
“महाराज का सम्मान नेताओं की अनुमति का मोहताज क्यों? महाराज पर राजनीति कब बंद होगी?” नेरूल का यह विवाद सिर्फ एक पुतले का मुद्दा नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति के कड़वे सच का आईना है, जिसमें जनता की श्रद्धा से ज्यादा नेताओं का ‘श्रेय’ मायने रखता है।



