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Election Exclusive : गणेश नाईक और NMMC चुनाव: किसे हराना चाहती है BJP !

Navi Mumbai Election: Does the BJP want to defeat its own Minister Ganesh Naik? Exclusive

नवी मुंबई/सुधीर शर्मा:  महाराष्ट्र में महानगर पालिका-नगर पंचायतों के चुनाव की तैयारियां तेज हो गयी हैं. दिसंबर 2025 या जनवरी 2026 के आखिर तक स्थानीय निकाय चुनाव होने वाले हैं. मुंबई बीएमसी और ठाणे जिले की नवी मुंबई मनपा का मामला सबसे अधिक सुर्खियों में है. ठाणे में शिवसेना चीफ एकनाथ शिंदे और नवी मुंबई के शिल्पकार और वनमंत्री गणेश नाईक के बीच चल रहा अंतर्कलह इसका बड़ा कारण है. शिवसेना और बीजेपी के स्थानीय नेताओं के बयानों से यह चिंता और बढ़ गई है कि महायुति के बीच गठबंधन होगा या नहीं. हालात संकेत दे रहे हैं कि नवी मुंबई और ठाणे जिले में महायुति के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. ऐसे में नवी मुंबई मनपा चुनाव में हिस्सा लेने के इच्छुक प्रत्याशियों के कान खड़े हो गए हैं. सभी महायुति के साथ अपने जीत का भविष्य देख रहे हैं. लेकिन असली सवाल तो शिवसेना और बीजेपी नेताओं के बीच चल रही भिडंत का है, माना जा रहा है कि यदि ऐसा ही रहा तो एकनाथ शिंदे की शिवसेना बीजेपी को पछाड़कर नवी मुंबई मनपा में कब्जा कर सकती है. नाईक ब्रांड नवी मुंबई की पहचान है लेकिन यह पहचान महायुति नेताओं की आंतरिक लड़ाई से धूमिल हो रहा है. महाविकास आघाड़ी से मुकाबले की बजाय शिवसेना और बीजेपी के स्थानीय नेता लगातार नाईक को डॉमिनेट करने की कोशिश में हैं. सवाल ये है कि तब मनपा चुनाव में हारेगा कौन.. और फिर जीत किसकी होगी.

प्रभागों में शिवसेना का दबदबा, हासिए पर बीजेपी

नवी मुंबई के 111 मनपा वार्डों की प्रभाग रचना पर नजर डालें तो शिवसेना और एकनाथ शिंदे का वर्चस्व साफ दिखता है. एक्सपर्ट का आकलन है कि उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने प्रभागों की रचना ऐसे की है जिससे शिवसेना के 60 से अधिक कैंडिडेट आसानी से जीत सकें, उदाहरण के लिए वाशी में शिवसेना जिलाप्रमुख किशोर पाटकर का प्रभाग देख सकते हैं. यहां 4 वार्डों में 3 पर शिवसेना का दबदबा है, नेरुल के जुई नगर में रंगनाथ आवटी के प्रभाग में 3 वार्डों में शिवसेना का वर्चस्व है. नवी मुंबई में ऐसे 18 प्रभाग हैं जहां शिवसेना कैंडिडेट के लिए चुनाव जीतना आसान होगा जबकि बीजेपी प्रत्याशियों के लिए मनपा चुनाव नाक से चने चबाने जैसा होगा. ताज्जुब की बात है कि 2500 आपत्तियों के बाद भी इन प्रभागों के बनावट में बीजेपी का अपेक्षित प्रभाव नहीं दिखता. एक्सपर्ट सवाल उठाते हैं कि गणेश नाईक की मांग के बावजूद बीजेपी आलाकमान और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस तरफ ज्यादा ध्यान क्यों नहीं दिया. एक बात और समझने वाली है कि जहां प्रभाग रचना पर गणेश नाईक खुलकर बोल रहे हैं वहीं बेलापुर की बीजेपी विधायक मंदा म्हात्रे खामोश नजर आती हैं. हालांकि मंचों से उनका जुबानी दावा जरूर है कि नवी मुंबई मनपा में बीजेपी का ही महापौर बैठेगा लेकिन इसके लिए उनकी जमीनी रणनीति कहीं नजर नहीं आती. दोनों बीजेपी विधायक एक दूसरे के खिलाफ और निजी वर्चस्व के लिए जूझ रहे हैं. नवनियुक्त जिलाध्यक्ष डॉ. राजेश पाटिल और विधायकों के बीच समन्वय का अभाव बीजेपी के लिए और मुश्किल बढ़ा रहा है.  शिवसेना जहां पक्ष प्रवेश के जरिए सक्रियता दिखा रही है वहीं बीजेपी ऐन चुनाव के नजदीक मरणासन्न दिख रही है. वर्तमान प्रभाग रचना और शिवसेना की रणनीति अगर सफल रही तो 2025-26 का मनपा चुनाव बीजेपी की जीत के लिए टेढ़ी खीर साबित हो सकता है.

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 मंत्री की उपेक्षा, संदीप नाईक पर असमंजस! राज क्या है..

राजनीतिक एक्सपर्ट मानते हैं कि नवी मुंबई के शिल्पकार कहे जाने वाले वनमंत्री गणेश नाईक को बीजेपी आलाकमान लगातार अनदेखा कर रहा है. एक विधायक, कद्दावर नेता और कई बार के अनुभवी मंत्री रहे गणेश नाईक के बदले पार्टी के मुखिया, उद्धव शिवसेना को रोकने वाले एकनाथ शिंदे को ज्यादा अहमियत मिल रही है. नवी मुंबई में शिवसेना के स्थानीय नेता भी नाईक पर हमलावर दिखते हैं. लोकसभा चुनाव में उनकी मांगों को दरकिनार कर नरेश म्हस्के को टिकट दिया गया. गणेश नाईक जानते थे कि यदि शिवसेना का सांसद बना तो ठाणे जिले में एकनाथ शिंदे की ताकत और बढ़ेगी. विधानसभा चुनाव में बेलापुर से संदीप नाईक को टिकट नहीं दिया गया.बेटे के विरोधी खेमे से चुनाव लड़ने के बाद से गणेश नाईक और भी हासिए पर आ गए हैं. उन्हें बीजेपी में वह सम्मान नहीं मिल रहा है जितना वे डिजर्व करते हैं. 14 गांवों का नवी मुंबई मनपा में समावेश, प्रभाग रचना में मनमानी, आपत्तियों के बावजूद गंभीर सुनवाई नहीं जैसे मुद्दे हैं जिन पर मुखरता से बोलने के पश्चात भी वनमंत्री गणेश नाईक अपनी सरकार से कुछ ज्यादा नहीं पा सके हैं. 111 सीटों पर हुई प्रभाग रचना शिंदे शिवसेना का वर्चस्व साफ दिखता है, वनमंत्री उसे बीजेपी के अनुकूल चाहते थे लेकिन उनकी नहीं सुनी गयी. पार्टी छोड़कर गए संदीप नाईक की घर वापसी कराने का मामला भी कई तारीखों के सामने आने के बाद असमंजस में है. वनमंत्री विधायक के कामकाज का दायरा ऐरोली तक सीमित कर दिया गया है. ऐसे में बीजेपी में बिखराव, भयंकर खेमेबाजी, कार्यकर्ताओं में असमंजस और तनाव की स्थिति बढ़ रही है.

एकनाथ शिंदे का जोर-मनपा में बैठे शिवसेना का महापौर

आंतरिक सूत्र बताते हैं कि उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने शिवसेना को नई ताकत देने, बीजेपी के मुकाबले ज्यादा नगरसेवकों को चुनकर लाने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है. शिंदे का जोर नवी मुंबई मनपा में पहली  बार शिवसेना का महापौर बिठाने पर है. इसके लिए लगातार कोशिशें चल रही हैं. राज्य में मंत्री होने के बाद भी वनमंत्री गणेश नाईक कई मोर्चों पर अपनी बात मनवाने, फैसला कराने में विफल और मजबूर दिखे हैं. उनका प्रयास भले ही नवी मुंबई के गतिमान विकास के लिए सकारात्मक रहा हो लेकिन खुद बीजेपी आलाकमान ने ही उन्हें अहमियत देना जरूरी नहीं समझा. हर मामले में प्रभावशाली दिखने वाले मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस नवी मुंबई से जुड़े मुद्दों और मामलों में एकनाथ शिंदे के मुकाबले लचर रवैया दिखाते रहे हैं. सूत्र बताते हैं कि बीजेपी ने सधी हुई कुटनीति के नाम पर खुद ऐसा धुंध फैला दिया है जिससे किसी को भी आलाकमान की नीयत साफ नहीं दिख रही है.

MLA मंदा म्हात्रे बेलापुर तक सीमित, कैसे जीतेंगे 111 सीट-एक्सपर्ट

तो सवाल ये है कि क्या बीजेपी, ने मनपा चुनाव को शिवसेना की झोली में डाल दिया है. क्या भाजपा, शिवसेना के मुकाबले नवी मुंबई में हारना चाहती है. या मनपा चुनाव की आड़ में मंत्री गणेश नाईक को हराने की कोई नई कूटनीति या साजिश चल रही है. एक्सपर्ट मानते हैं कि बीजेपी गणेश नाईक के वर्चस्व को खुद बढ़ने नहीं देना चाहती, उनकी मांगों को दरकिनार करना इसका संकेत देता है. जाहिर है नाईक को खुला हैंड नहीं मिल रहा है. बेलापुर में उनके सक्रियता पर पाबंदी जैसी लग गई है. कहा जा रहा है कि यदि नाईक इसी तरह बंदिशों में रहे तो नवी मुंबई मनपा में सत्ता हासिल करना संभव नहीं होगा. राजनीतिक पंडित मानते हैं कि विधायक मंदाताई म्हात्रे शिवसेना को रोक पाने और अपनी केपेबिलिटी के जरिए 111 वार्डों के चुनाव को प्रभावित करने में समर्थ नहीं हैं.वे सिर्फ बेलापुर और उसके आसपास के चंद इलाकों में ही सक्रिय हैं जो पर्याप्त नहीं है. नगरसेवकों की जो ताकत दिख रही है वह गणेश नाईक के समर्थकों की है.एनसीपी छोड़ते समय गणेश नाईक अपने साथ 50 नगरसेवक लेकर बीजेपी में शामिल हुए थे. तब बीजेपी के सिर्फ 5 नगरसेवक थे. जाहिर है,  गणेश नाईक के कारण ही नवी मुंबई में बीजेपी की ताकत बढ़ी, उसी के दम पर बीते चुनावों में महायुति को ऐतिहासिक जीत हासिल करने में मदद मिली. फिर भी वनमंत्री गणेश नाईक आज अपनी ही पार्टी और सरकार में हासिए पर हैं. बीजेपी कार्यकर्ताओं का सवाल है कि कहीं बीजेपी अपने ही कद्दावर मंत्री की ताकत को कतरने और हारने के लिए मजबूर तो कर रही है.

यह धुंधला मंजर बीजेपी में आए नगरसेवकों और कार्यकर्ताओं की टेंशन बढ़ा रहा है जो गणेश नाईक के सहारे अपना भविष्य सेट करते रहे हैं. उन्हें बीजेपी के अलावा शिंदे शिवसेना और अन्य पार्टियों का विकल्प चुनने के लिए प्रेरित कर रहा है जहां उनकी साख और सीट दोनों कायम रह सके.

Sudhir Sharma

Sudhir Sharma

33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. नवभारत, दैनिक भास्कर समेत कई अखबारों एवं आजतक, एनडीटीवी सहारा जैसे चैनलों में काम कर चुके हैं. राजनीतिक मुद्दों पर बेबाकी से रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं.

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