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मनोज जरांगे पाटिल को फिर मिला जीआर, क्या मराठा आरक्षण दे पाएगी सरकार

Manoj Jarange Patil again got GR, will the government be able to give Maratha reservation

नवी मुंबई/प्रतिनिधि : मुंबई के आजाद मैदान में 29 अगस्त से 2 सितंबर तक यानी 5 दिनों तक चली मराठा आरक्षण महारैली का समापन हो गया. एक बार फिर संघर्ष योद्धा मनोज जरांगे पाटिल के सामने देवेंद्र फडणवीस की महायुति सरकार नतमस्तक नजर आयी. 1 सितंबर को जहां मुंबई पुलिस ने उन्हें आजाद मैदान खाली करने का फरमान जारी किया था, लेकिन मनोज  जरांगे पाटिल ने साफ कह दिया था कि जब तक मराठा समाज को आरक्षण नहीं दिया जाता वे मुंबई से नहीं हटेंगे. महारैली के कारण मुंबई सिटी को हो रही मुसीबतों के मद्देनजर सरकार को झुकना पड़ा, उद्योग मंत्री उदय सामंत और राधाकृष्ण विखे पाटिल ने सरकार की ओर से जरांगे पाटिल से संवाद किया और उन्हें मराठा आरक्षण को मंजूरी वाला नया जीआर थमाकर उनसे आमरण तोड़ने का आग्रह किया. 8 मांगों में से 6 मांगों को मान लिया गया, मंत्रियों ने सरकार का लिखित हलफनामा पढ़कर सुनाया जिसके बाद मनोज जरांगे पाटिल मान गए. मराठा महारैली का समापन हो गया. पुलिस ने कहा था कि इस महारैली ने सारे नियम कानूनों का ध्वस्त कर दिया था, और मुंबई के लिए सुरक्षा, कानून व्यवस्था और सेहत का बड़ा संकट बढ़ा दिया था, आंदोलन खत्म कराने का दबाव था. आंदोलन खत्म हो गया. मनोज जरांगे पाटिल ने घोषणा कर दी और मराठा आंदोलक गुलाल की होली खेलते हुए जल्लोष करने लगे. यानी मनोज जरांगे पाटिल जीत गए, सरकार हार गई.

मराठा आरक्षण आंदोलन का यह दूसरा चैप्टर है. इस चैप्टर में मनोज जरांगे पाटिल ने मुंबई के सीने पर बैठकर आरक्षण की मांग की. परमिशन के बिना आंदोलन किए. इसलिए सरकार को झुकना पड़ा, माना जा सकता है कि सरकार ने नया जीआर थमाकर मराठा आंदोलन को खत्म करा दिया है. मुंबई अब ट्रैफिक जाम, बदहाली और सुरक्षा खतरों से मुक्त हो गयी है. सरकार, एक बार फिर आश्वासनों का पुलिंदा थमाकर आंदोलन और महारैली के प्रभाव को कम करने में सफल रही है, मराठा आंदोलक इसे जीत मान रहे हैं. मानना भी चाहिए क्योंकि मनोज जरांगे पाटिल की 8 मांगों में से 6 मांगों को सरकार ने मान लिया गया है, तो क्या यह मान लिया जाए कि अब मराठा समाज को आरक्षण मिल जाएगा. असली सवाल तो सरकार के दूसरे जीआर या हलफनामे पर अमल का है. बात सरकार के दावों की नहीं है, बल्कि इरादों की है. संवैधानिक दांव पेंच की है, ओबीसी आरक्षण को छेड़े बिना मराठा समाज को रिजर्वेशन देने की है. सवाल पहले जीआर पर की गई वादाखिलाफी का है….तो सवाल ये है कि क्या इस जीआर पर सरकार खरी उतर पाएगी.

जीं हां यह सवाल इसलिए बड़ा है क्योंकि ऐसा ही एक जीआर पिछले साल 2024 में भी सरकार ने दिया था..और ढिंढोरा पीटते हुए यह दावा किया था कि अब मराठा समाज को आरक्षण के लिए आंदोलन नहीं करना पड़ेगा.  आज का आंदोलन गवाही देता  है कि सरकार ने उस जीआर पर पर्याप्त अमल नहीं किया. तब खुद नगरविकास मंत्री डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे ने नवी मुंबई के वाशी तक पहुंचे मनोज जरांगे पाटिल को जीआर थमाकर आरक्षण का भरोसा दिलाया था.  हजारों की संख्या में जमा हुए मराठा आंदोलकों के सामने एकनाथ शिंदे ने छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा पर हाथ रखकर कसम खाई थी कि आरक्षण देंगे. इस आंदोलन के बाद एकनाथ शिंदे महाराष्ट्र के नए मराठा नेता के तौर पर जमकर उभरे…हालांकि मराठा आंदोलकों ने बाद में उनके जीआर पूरी तरह झूठा और असंवैधानिक पाया. खबर यह भी फैली कि शिंदे तो आरक्षण देना चाहते हैं लेकिन सीएम देवेंद्र फडणवीस ऐसा करने से रोक रहे हैं.. इसे अंदरखाने चल रही वर्चस्व की लड़ाई के तौर पर भी देखा गया. खैर हम बात कर रहे हैं आरक्षण के नए जीआर और सरकार के हलफनामे की..

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