Parvati-Pandurang : विवाहित जोड़ों के लिए रोल मॉडल क्यों हैं पार्वती-पांडुरंग की लव स्टोरी
Why is Parvati-Pandurang's love story a role model for married couples
सुधीर शर्माः नए दौर में जब परिवार बिखर रहे हैं, आपाधापी, पैसे कमाने की धुन और जीवन की व्यस्ताताओं से संस्कारों की दीवार टूट रही है. शादी-विवाह के महज चंद वर्षों के भीतर दांपत्य जीवन दरकने लगा है और पढ़े लिखे पति-पत्नी भी अबोध और मासूम बच्चों की चिंता छोड़कर एक दूजे के साथ रहने को तैयार नहीं है. तब सानपाड़ा के वरिष्ठ ग्रामस्थ पांडुरंग पाटिल और उनकी पत्नी पार्वती पाटिल का सत्कार सुर्खियां बन जाता है. 80 साल के पार्वती पांडुरंग पाटिल ताजा उदाहरण हैं जिन्होंने अपने दांपत्य जीवन का 60 साल पूरा किया है. जाहिर है इन 6 दशकों में इस दंपत्ति के बीच भी आचार-विचार, शिक्षा, सऊर और व्यावहारिक विरोधाभास रहे होंगे, तकरार हुई होगी फिर भी इन्होंने बच्चों को पालते-संभालते हुए अपने परिवार और दांपत्य संबंधों को बनाए रखा. बात कभी डायवोर्स नहीं पहुंचने दी और इसीलिए उनकी जिंदगी आज नई पीढ़ी के लिए आइना है.
टूटती शादियां, बिखरता बचपन, ध्वस्त हो रही परिवार व्यवस्था
नवी मुंबई स्टूडेंट यूथ फोरम ने आज पार्वती पांडुरंग पाटिल को आदर आतिथ्य दिया और उन्हें विशेष तौर पर सम्मानित किया. अनाज और पुस्तकों का तुलादान किया गया, दंपत्ति के नाम पर दी गई तुलादान सामग्री गरीबों और जरूरतमंद बच्चों में बांटी जाएगी. इस अनूठे समारोह में खुद राज्य के वनमंत्री गणेश नाईक भी अपने बेटों पूर्व सांसद डॉ. संजीव नाईक और पूर्व विधायक संदीप नाईक के साथ नजर आए. मंत्री गणेश नाईक ने स्टूडेंट यूथ फाउंडेशन द्वारा दंपत्ति के सत्कार को नई पहल बताया. उन्होंने कहा कि पार्वती-पांडुरंग पाटिल ने दांपत्य जीवन के 60 वर्ष कैसे बिताए यह समझने और सीखने लायक है. उनके जैसे दंपत्तियों का जीवन चरित नई पीढ़ी के युवाओं और दंपत्तियों के लिए सबक है कि उन्हें सुख-दुख, आनंद और संघर्ष में साथ रहना कैसे रहना चाहिए. इसी में सुखी विवाहित जीवन का मंत्र छुपा है. वनमंत्री ने कहा पार्वती-पांडुरंग से प्रेरणा लेकर नई पीढ़ी अपनी शादी, परिवार और रिश्तो को संवार सकती है, अपने बच्चों का सुनहरा भविष्य लिख सकती है. उनके सत्कार की पहल लाजवाब है.
वैवाहिक विवादों से नरक बनी 12 लाखों बच्चों की जिंदगी
सवाल ये है कि आखिर लवली लाइफ की सिक्सटी पार कर रहे यंग दंपत्ति पार्वती पांडुरंग पाटिल प्रेरणा क्यों हैं. देश भर के आकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि महज साल भर में तलाक और विवाह विच्छेद के कारण 12 लाख बच्चे लावारिस, पालकहीन और अपमान के शिकार पाए गए हैं. यह संख्या हर साल बढ़ रही है. तलाक के मामलों से छोटी-बड़ी सभी अदालतें भरी पड़ी हैं और इन विवादों का जहर ऐसे दंपत्तियों से पैदा हुए बच्चों की जिंदगी निगल रहा है. चूंकि शादियां टूट रही हैं तो परिवार का अस्तित्व भी खंडित हो रहा है. एकल माता-पिता बच्चों का सम्पूर्ण पालन पोषण करने में असमर्थ हैं. इसका सबसे अधिक नुकसान उन बच्चों की मानसिकता पर हो रहा है जो दंपत्तियों के आपसी कलह और नफरत के बीच पलने को मजूबर हैं. मां-बाप की असहमति, संघर्ष और विवादों के कारण उनका मनोबल, परिवार के प्रति आस्था और विश्वास सब कुछ टूट रहा है.पति-पत्नि का अलग होना बच्चों के साथ अपराध 
हमारे पीछे की अपनी एक पीढ़ी पर नजर डालें तो समझ आता है कि पार्वती पांडुरंग पाटिल की तरह हमारे मां-बाप, परिजन और पड़ोसियों में असंख्य लोग मिल जाएंगे जिन्होंने तमाम विसंगतियों और मुश्किलों के बावजूद अपने दांपत्य संबंधों को टिकाए रखा. विवाह व्यवस्था के प्रति आस्था बनाए रखी. आज के हमारे संस्कार, सुकून और समन्वय सब उनके द्वारा पोषित माहौल की ही देन हैं जिसमें उन्होंनें खुद प्यार और सद्भावना के साथ जिया, ताकि हमारे लिए जीने का सम्मानित वातावरण मिल सके. वरिष्ठ नेता दशरथ भगत मानते हैं कि ऐसे दंपत्ति उन सबके लिए प्रेरक हैं जो शादी करने वाले हैं या विवाह व्यवस्था में जी रहे हैं. उन्हें यह समझना होगा कि दांपत्य जीवन सिर्फ पति या सिर्फ पत्नी की एकल जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि साझा उत्तरदायित्व है, मिलकर रहने का, बच्चों के पालन पोषण का, सद्भावना के साथ जीवन यापन का..इसकी कमी बच्चों को अपमान, तिरस्कार, और मानसिक विकृति की ओर ले जा रही है. नव दंपत्तियों की तकरार बच्चों में असुरक्षा की भावना और अकेलापन पैदा कर रही है. उनका स्वतंत्र और खुशहाल बचपन छीन रही है जो बड़ा अपराध है. इसमें गुनाह मां-बाप से हो रहा है लेकिन उसकी सजा पूरी तरह बच्चों को भोगनी पड़ रही है.देश का भविष्य नष्ट हो रहा है. आखिर इसकी सजा मां बाप को क्यों नहीं मिलनी चाहिए.



