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काशी के गंगा घाटों पर पितरों का विसर्जन, श्रद्धालुओं ने किया तर्पण
Rituals for ancestors performed at the Ganga ghats of Kashi devotees offered Tarpan.

उत्तर प्रदेश, वाराणसी: वाराणसी में काशी के गंगा घाटों पर आज पितृ विसर्जन के अवसर पर श्रद्धालु गंगा स्नान, तर्पण और पूजा-अर्चना कर रहे हैं। लोगों ने विधि-विधान से अपने पितरों को श्रद्धांजलि अर्पित की और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। गंगा घाटों पर सुबह से ही धार्मिक गतिविधियां जारी हैं। पितृ विसर्जन (सर्वपितृ अमावस्या) का मुख्य कारण अपने पितरों (पूर्वजों) को सम्मानपूर्वक विदा करना और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करना है। हिंदू धर्म में इसे पितृ पक्ष का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है।
- अज्ञात पितरों का तर्पण: जिन पूर्वजों की मृत्यु की तिथि (तिथि) याद नहीं होती, उन सभी का श्राद्ध और तर्पण इसी दिन किया जाता है। इसलिए इसे ‘सर्वपितृ अमावस्या’ भी कहते हैं।
- पितृ दोष से मुक्ति: इस दिन विधि-विधान से पिंडदान और दान-पुण्य करने से कुंडली में मौजूद पितृ दोष शांत होता है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है।
- आशीर्वाद की प्राप्ति: माना जाता है कि पितृ पक्ष के 15 दिनों तक पूर्वज पृथ्वी पर अपने परिवार के बीच रहते हैं। अमावस्या के दिन तर्पण स्वीकार करके वे तृप्त होते हैं और अपने वंशजों को सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि का आशीर्वाद देकर पितृलोक लौट जाते हैं।
- भूल-चूक की क्षमा याचना: यदि पितृ पक्ष के दौरान किसी कारणवश श्राद्ध छूट गया हो, तो इस अंतिम दिन पूजा और दान करने से पूरे पक्ष का पुण्य मिल जाता है।
वाराणसी (काशी) के दशाश्वमेध घाट समेत विभिन्न गंगा घाटों पर शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या के पावन अवसर पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। श्रद्धालुओं ने मां गंगा में आस्था की डुबकी लगाई और पुरोहितों के मंत्रोच्चार के बीच अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए विधि-विधान से तर्पण और पिंडदान किया। इस दिन कुश, काले तिल, जौ, सफेद फूल और गंगाजल अर्पित कर पितरों को विदाई दी जाती है, जिससे पितृदोष से मुक्ति मिलती है। जो लोग घाट तक नहीं पहुंच सके, उन्होंने अपने घरों में रहकर माता-पिता का पूजन किया और तुलसी के पौधे में जल अर्पित किया।



