
योग के प्रचार के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा का संरक्षण जरूरी
Preservation of the Indian knowledge tradition is essential alongside the promotion of yoga.
महाराष्ट्र, पुणे : भारत में योग की बढ़ती वैश्विक लोकप्रियता के बीच योग के मूल सिद्धांतों, वैज्ञानिक आधार और भारतीय दर्शन से उसके संबंध को बनाए रखना बेहद जरूरी है। योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि शारीरिक तंदुरुस्ती, मानसिक संतुलन और समग्र स्वास्थ्य को बढ़ावा देने वाली भारतीय ज्ञान परंपरा है। यह बात महाराष्ट्र के राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा ने कही। राज्यपाल ने कैवल्यधाम योग संस्था की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि यह संस्था भारत के लिए गौरव का विषय है। करीब एक शताब्दी पहले स्वामी कुवलयानंद ने वैज्ञानिक अनुसंधान, शिक्षा और योग के व्यावहारिक अभ्यास के माध्यम से योग के प्रचार-प्रसार और संरक्षण के उद्देश्य से कैवल्यधाम की स्थापना की थी। आज यह संस्था योग और भारतीय संस्कृति के क्षेत्र में राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी है।
योग की शुद्धता बनाए रखने की जिम्मेदारी
राज्यपाल ने कहा कि दुनिया में योग के प्रति बढ़ती रुचि के बीच कैवल्यधाम जैसी संस्थाओं की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। इन संस्थाओं को प्रशिक्षित योग शिक्षक, प्रशिक्षक और शोधकर्ता तैयार करने चाहिए। उन्होंने कहा कि आधुनिक दुनिया के साथ प्रभावी संवाद करते हुए योग की शुद्धता, प्रामाणिकता और मूल स्वरूप को बनाए रखना आवश्यक है। कैवल्यधाम को आने वाले समय में योग के अभ्यासकर्ताओं, शिक्षकों और दूतों की नई पीढ़ी तैयार कर भारतीय ज्ञान परंपरा को देश के हर हिस्से के साथ-साथ पूरी दुनिया तक पहुंचाने का प्रयास करना चाहिए।
गोर्धनदास सेक्सरिया कॉलेज का अमृत महोत्सव
राज्यपाल ने गोर्धनदास सेक्सरिया कॉलेज ऑफ योग एंड कल्चरल सिंथेसिस के 75 वर्ष पूरे होने को भी महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि यह केवल किसी एक शैक्षणिक संस्था की 75 वर्षों की यात्रा का उत्सव नहीं है, बल्कि भारत की महान ज्ञान परंपरा को संरक्षित और आगे बढ़ाने के 75 वर्षों का उत्सव है।उन्होंने कहा कि ऐसी संस्थाएं भारतीय ज्ञान, संस्कृति और योग परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
कैवल्यधाम का ज्ञान विश्व कल्याण के लिए उपलब्ध कराने का संकल्प
कैवल्यधाम के चेयरमैन और पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री प्रभु ने कहा कि संस्था ने पिछले करीब एक शताब्दी में योग के क्षेत्र में व्यापक ज्ञान, अनुभव और समृद्ध परंपरा अर्जित की है। उन्होंने कहा कि कैवल्यधाम का उद्देश्य इस ज्ञान को केवल संस्था तक सीमित रखना नहीं, बल्कि इसे विश्व कल्याण के लिए उपलब्ध कराना है। आने वाले समय में कैवल्यधाम के ज्ञान और अनुभव को दुनिया के अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए व्यापक स्तर पर प्रयास किए जाएंगे। कैवल्यधाम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुबोध तिवारी ने कार्यक्रम की प्रस्तावना प्रस्तुत की। उन्होंने संस्था की ओर से योग, शिक्षा, अनुसंधान और भारतीय संस्कृति से जुड़े विभिन्न कार्यक्रमों की जानकारी दी। इस अवसर पर गोर्धनदास सेक्सरिया कॉलेज ऑफ योग एंड कल्चरल सिंथेसिस के श्री राकेश सेक्सरिया ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम के दौरान स्वामी कुवलयानंद के पत्रों पर आधारित पुस्तक का विमोचन भी किया गया। इस अवसर पर कॉलेज के प्राध्यापक, विद्यार्थी, पूर्व विद्यार्थी और कैवल्यधाम परिवार से जुड़े सदस्य उपस्थित रहे। कार्यक्रम में योग की वैज्ञानिकता, भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा को संरक्षित रखते हुए उसे आधुनिक दुनिया तक पहुंचाने की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया गया।



