मत्स्य संपदा योजना से बदली आदिवासी परिवारों की जिंदगी
Matsya Sampada Yojana transforms the lives of tribal families.

झारखंड,गढ़वा: झारखंड के गढ़वा जिले में मछली पालन अब आदिवासी और मछुआरा परिवारों के लिए रोजगार और आय का नया माध्यम बन रहा है। चिनिया प्रखंड के चिरका जलाशय में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत केज तकनीक से मछली पालन किया जा रहा है। इस पहल से जलाशय के आसपास रहने वाले कई परिवारों को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिला है और उनकी आमदनी में भी बढ़ोतरी हुई है। चिनिया प्रखंड स्थित चिरका जलाशय में मत्स्य विभाग की पहल पर केज तकनीक के माध्यम से मछली पालन किया जा रहा है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत आदिवासी और मछुआरा परिवारों को समूहों से जोड़कर इस तकनीक के जरिए रोजगार उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया है। केज तकनीक में जलाशय के पानी के भीतर जाल या संरचना तैयार कर उसमें मछलियों का पालन किया जाता है। इससे उपलब्ध जल संसाधन का उपयोग करते हुए मछली उत्पादन को बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है।
मजदूरी के लिए बाहर जाने की मजबूरी हुई कम
चिरका जलाशय के आसपास रहने वाले ग्रामीण परिवारों के लिए यह योजना आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण साबित हो रही है। लाभुक परिवारों के अनुसार, पहले रोजगार के सीमित अवसरों के कारण उन्हें मजदूरी करने के लिए दूसरे स्थानों पर जाना पड़ता था। अब स्थानीय स्तर पर ही मछली पालन का काम मिलने से उन्हें अपने गांव और आसपास रहकर आय अर्जित करने का अवसर मिल रहा है। इससे परिवारों को रोजगार के साथ-साथ अपने घर और बच्चों की जिम्मेदारियों को बेहतर तरीके से संभालने में मदद मिल रही है।
हर महीने 20 से 25 हजार रुपये तक की आमदनी
मत्स्य संपदा योजना के लाभुकों का कहना है कि केज तकनीक से मछली पालन के जरिए उन्हें हर महीने लगभग 20 से 25 हजार रुपये तक की आमदनी हो रही है। हालांकि आय मछली उत्पादन और अन्य परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।ग्रामीणों के मुताबिक, मछली पालन से होने वाली आमदनी का उपयोग बच्चों की पढ़ाई, घर की जरूरतों और रोजमर्रा के खर्चों को पूरा करने में किया जा रहा है। लाभुकों का कहना है कि पहले परिवार की आर्थिक स्थिति को लेकर कई तरह की परेशानियां थीं, लेकिन स्थानीय स्तर पर रोजगार का अवसर मिलने से अब आर्थिक स्थिति में सुधार की उम्मीद बढ़ी है।
आदिवासी और मछुआरा परिवारों को मिला रोजगार
मत्स्य विभाग ने प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के माध्यम से स्थानीय आदिवासी और मछुआरा परिवारों को मत्स्य पालन से जोड़ने की पहल की है। इसका उद्देश्य जल संसाधनों का बेहतर उपयोग करने के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा करना है। जिला मत्स्य पदाधिकारी धनराज आर. कापसे के अनुसार, चिरका जलाशय में केज तकनीक के माध्यम से मत्स्य पालन को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे स्थानीय लोगों को मत्स्य व्यवसाय से जोड़ने और उनकी आर्थिक गतिविधियों को मजबूत करने में मदद मिल रही है।
गांव में लौट रही आर्थिक खुशहाली
मछली पालन से होने वाली आय का असर ग्रामीण परिवारों के जीवन पर भी दिखाई दे रहा है। लाभुक परिवारों के अनुसार, अब उन्हें रोजगार के लिए पूरी तरह बाहर जाने पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। स्थानीय स्तर पर काम मिलने से समय और यात्रा का खर्च भी बचता है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि आने वाले समय में केज तकनीक से मछली पालन का दायरा और बढ़ाया जाएगा, जिससे चिरका जलाशय के आसपास रहने वाले अधिक परिवारों को रोजगार मिल सके।
योजना का दायरा बढ़ाने की उम्मीद
चिरका जलाशय में चल रही यह पहल ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक नए अवसर के रूप में सामने आई है। स्थानीय लाभुक चाहते हैं कि मत्स्य पालन से जुड़े प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और अन्य सुविधाओं का विस्तार किया जाए, ताकि अधिक से अधिक आदिवासी और मछुआरा परिवार इस रोजगार से जुड़ सकें। गढ़वा के चिरका जलाशय में केज तकनीक से हो रहा मछली पालन फिलहाल कई परिवारों के लिए रोजगार, आय और आत्मनिर्भरता का नया रास्ता बन रहा है। ग्रामीणों की उम्मीद है कि इस पहल का विस्तार होने से क्षेत्र में रोजगार के और अवसर पैदा होंगे तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।



