प्रियंका सौरभ/ जमीन से अंतरिक्ष तक महिलाएं अपनी बुद्धिमत्ता, हुनर और हौसले का परचम लहरा रही हैं. यह सब तेजी से आगे बढ़ रही महिलाओं की सफलता और सक्रियता का सबूत है.बीते दस वर्षों में ही देखें तो युवा भारतीय महिलाओं के लक्ष्यों और महत्त्वाकांक्षाओं में उल्लेखनीय बदलाव आया है, जो उनकी बढ़ती स्वतंत्रता, शैक्षिक उपलब्धियों और कार्यबल में भागीदारी को दर्शाता है। यह बदलाव भारत के सामाजिक ताने-बाने को महत्त्वपूर्ण रूप से बदल रहा है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (NSSO) उच्च शिक्षा में महिलाओं के नामांकन की बढ़ती प्रवृत्ति की ओर इशारा करता है. युवा महिलाएँ अब अपने पेशेवर लक्ष्यों पर अधिक ज़ोर दे रही हैं, जो विभिन्न कैरियर अवसरों और डिजिटल कौशल प्रशिक्षण तक पहुँच से प्रेरित है। स्किल इंडिया मिशन और एसटीईएम (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित) फॉर गर्ल्स इंडिया जैसी पहलों ने तकनीकी क्षेत्रों में युवा महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाया है। आकड़ें बताते हैं कि देश की तमाम युवा महिलाएँ अनुकूलता के आधार पर अपना साथी चुन रही हैं. आज, लड़कियाँ उच्च शिक्षा और कौशल विकास में भी लड़कों से मजबूत बराबरी करती दिख रही हैं. ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई में लड़कियों की संख्या लगातार बढ़ रही है जो उनके बढ़ते कदमों का संकेत है.
यह दिवस हमें महिलाओं द्वारा समाज में दिए गए योगदान, उनके संघर्ष तथा उनके सामने आने वाली चुनौतियों की याद दिलाता है। इस दिन उन्हें यह ऐहसास कराया जाता है कि वह हमारे लिए कितनी खास हैं। भारत में आजादी के बाद लगातार सुधारों से महिलाओं को पुरुषों की तरह सशक्त बनाया गया है। वह आज स्वावलंबी और स्वतंत्र है। क्योंकि जब महिलाएँ आर्थिक रूप से स्वतंत्र होती हैं, तो वे किसी भी तरह की हिंसा को बर्दाश्त नहीं करती हैं। इसलिए हर स्तर पर सामूहिक प्रयास सार्थक बदलाव ला सकते हैं। जब महिलाओं का सम्मान बढ़ेगा तभी समग्र स्थिति में सुधार हो सकेगा.
उभरती आकांक्षाओं को मिल रहा सरकार का सहारा
महिलाएँ आर्थिक स्वतंत्रता भी प्राप्त कर रही हैं, विशेष रूप से उद्यमिता के माध्यम से, जो महिलाओं के नेतृत्व वाले स्टार्टअप के लिए
Women are choosing their own destination and path herself
सरकारी पहलों द्वारा समर्थित है। नीति आयोग द्वारा महिला उद्यमिता मंच ने 10, 000 से अधिक महिला उद्यमियों का एक नेटवर्क बनाया है। युवा महिलाएँ स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय शासन में अधिक भागीदारी के साथ, राजनीति में अधिक सक्रिय हो रही हैं। ग्रामीण महिलाओं के बीच स्वयं सहायता समूहों की सदस्यता 2012 में 10% से बढ़कर 2022 में 18% होने की उम्मीद है। ये उभरती हुई आकांक्षाएँ पारंपरिक सामाजिक मानदंडों और संरचनाओं को चुनौती दे रही हैं। जैसे-जैसे अधिक महिलाएँ कार्यबल में प्रवेश कर रही हैं, घरों में पारंपरिक लिंग भूमिकाएँ बदल रही हैं। मनरेगा कार्यक्रम पुरुषों और महिलाओं के लिए समान वेतन सुनिश्चित करता है, जो ग्रामीण परिवार की गतिशीलता को प्रभावित करता है। शिक्षा और आय में वृद्धि के साथ, युवा महिलाएँ अपने परिवारों के भीतर वित्तीय और सामाजिक निर्णयों पर अधिक प्रभाव प्राप्त कर रही हैं। स्वयं सहायता समूहों ने ग्रामीण महिलाओं को घरेलू वित्त का सामूहिक रूप से प्रबंधन करने के लिए सशक्त बनाया है।
सिर्फ रौशनी नहीं, रौशनी को जलाने वाली लौ भी है
भारत के प्रथम नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर ने खूबसूरती से व्यक्त किया है, महिलाएँ सिर्फ़ घर की रोशनी ही नहीं हैं, बल्कि उस रोशनी को जलाने वाली लौ भी हैं। पूरे इतिहास में, महिलाओं ने मानवता को प्रेरित किया है, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से लेकर भारत की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले तक, सबने समाज में परिवर्तनकारी बदलाव का उदाहरण पेश किया है। वर्तमान में, प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और समावेशी आर्थिक और सामाजिक विकास जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने पर ज़ोर दिया जा रहा है। महिलाओं के अंतर्निहित नेतृत्व गुण समाज के लिए अमूल्य हैं। अमेरिकी धार्मिक नेता ब्रिघम यंग ने समझदारी से कहा था, एक पुरुष को शिक्षित करने से एक व्यक्ति को लाभ होता है, लेकिन एक महिला को शिक्षित करने से पूरी पीढ़ी को लाभ होता है।भारत सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण क़दम उठा रहा है, जिसका लक्ष्य 2030 तक सभी के लिए एक बेहतर दुनिया बनाना है। इन लक्ष्यों का एक प्रमुख लक्ष्य लैंगिक समानता को बढ़ावा देना और महिलाओं को सशक्त बनाना है।