टाटा सन्स में आमने-सामने बोर्ड और Tata Trusts, चंद्रशेखरन के भविष्य पर बड़ा सवाल
Face-off between Tata Sons board and Tata Trusts big question mark over Chandrasekaran's future.

नई दिल्ली: टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा सन्स (Tata Sons) में नेतृत्व को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। 17 सितंबर को हुई बोर्ड बैठक में एन. चंद्रशेखरन (N. Chandrasekaran) को कार्यकारी अध्यक्ष यानी Executive Chairman के रूप में एक और पांच साल के कार्यकाल के लिए पुनर्नियुक्त करने का प्रस्ताव बहुमत से पारित किया गया। उनका मौजूदा कार्यकाल फरवरी 2027 में समाप्त होना है। टाटा सन्स के अनुसार, चंद्रशेखरन ने पहले दोबारा पद स्वीकार नहीं करने का निर्णय व्यक्त किया था। हालांकि, बोर्ड के अनुरोध पर उन्होंने अपने निर्णय पर पुनर्विचार किया और इसके बाद बोर्ड ने उनकी पुनर्नियुक्ति के पक्ष में मतदान किया। लेकिन इस फैसले के तुरंत बाद टाटा ट्रस्ट्स ने इसका विरोध कर दिया। टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने पुनर्नियुक्ति के खिलाफ मतदान किया। टाटा ट्रस्ट्स और उससे जुड़े ट्रस्ट्स के पास टाटा सन्स में लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि कंपनी के Articles of Association के तहत चेयरमैन की नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति से जुड़े फैसले में ट्रस्ट्स द्वारा नामित निदेशकों की सहमति आवश्यक है। इसी आधार पर ट्रस्ट्स ने बोर्ड के प्रस्ताव की वैधता पर सवाल उठाया है।
बोर्ड में बहुमत, लेकिन ट्रस्ट्स का विरोध
छह सदस्यीय बोर्ड में चार निदेशकों ने चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के पक्ष में मतदान किया, जबकि नोएल टाटा ने विरोध किया। चंद्रशेखरन ने स्वयं मतदान नहीं किया। इस तरह प्रस्ताव बोर्ड स्तर पर बहुमत से पारित हो गया, लेकिन इससे टाटा सन्स के भीतर मतभेद और गहरा गए हैं। टाटा ट्रस्ट्स की आपत्ति केवल नेतृत्व तक सीमित नहीं है। टाटा सन्स की भविष्य की लिस्टिंग और IPO को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच मतभेद सामने आए हैं।
Tata Sons की लिस्टिंग पर भी बड़ा फैसला
बोर्ड ने लागू RBI दिशानिर्देशों के अनुरूप टाटा सन्स की संभावित सार्वजनिक लिस्टिंग की दिशा में आगे बढ़ने का फैसला किया है और इस प्रक्रिया में RBI, Tata Trusts तथा अन्य हितधारकों से आवश्यक मार्गदर्शन लेने की बात कही है। यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि RBI ने Tata Sons को एक Upper-Layer NBFC के रूप में वर्गीकृत किया है और नियामकीय अनुपालन के तहत लिस्टिंग का प्रश्न फिर केंद्र में आ गया है। हालांकि, बोर्ड का यह फैसला अपने आप में तत्काल IPO होने का संकेत नहीं है; इसके लिए आगे कई नियामकीय, कॉरपोरेट और शेयरधारक स्तर की प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति का मुद्दा अब केवल बोर्डरूम तक सीमित नहीं रह गया है। आगे शेयरधारकों की बैठक (AGM) और कंपनी के Articles of Association की व्याख्या महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। टाटा ट्रस्ट्स की लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच टाटा सन्स के सामने दो बड़े सवाल हैं—पहला, एन. चंद्रशेखरन का अगला कार्यकाल किस तरह अंतिम रूप लेगा, और दूसरा, टाटा सन्स की लिस्टिंग किस दिशा में आगे बढ़ेगी।
दोनों मुद्दों पर बोर्ड और Tata Trusts के बीच सहमति बनना आने वाले समय में महत्वपूर्ण होगा।



